कामिनी की कामुक गाथा (भाग 14)

प्रिय पाठकों, पिछले भाग में अपने पढ़ा कि किस तरह मेरे दादाजी और बड़े दादाजी ने मेरी मां को अपनी हवस का शिकार बनाया और मनमाने ढंग से मेरी मां को भोगा। अपनी गंदी सोच को कार्यरूप में परिणत कर दिया और रिश्ते की मर्यादा को तार तार करते हुए मेरी मां को एक बेटे की मां बना डाला। मेरी मां भी उनकी वासना की आग में झुलस कर कामुकता पूर्ण खेल में खुल कर भाग लेने लगी और रिश्तों की मर्यादा भूल गयी। पापा की कमजोरी भी उसकी एक वजह थी, इसलिए मेरी मां को क्या दोष दूं। खैर जो हुआ सो हुआ मगर इस तरह कामलोलुप मर्दों की भोग्या बन कर मेरी मां को पराए मर्दों का चस्का लग चुका था। हरिया, मेरे पापा, दादाजी और बड़े दादाजी के विभिन्नता भरे नित नवीन तरह की कामुकतापूर्ण खेल से मेरी मां के अंदर वासना का समुंदर हिलोरें लेने लगा जिसका पूरा फायदा मेरे दादाजी और बड़े दादाजी ने जी भर के उठाया। मेरे छोटे भाई के पैदा होने के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति की खुशी में घर वाले जश्न मनाने लगे। इधर मेरी मां के साथ उनका अनैतिक संबंध ज्यों का त्यों चलता ही रहा। मेरा भाई रितेश ज्यों ज्यों वह बड़ा होता गया वह मां बाप के अत्यथिक लाड़ प्यार के कारण बिगड़ता चला गया। आवारा साथियों के सोहबत में वह 15 साल की उम्र से ही नशे का आदी हो गया। उसके आवारा दोस्त अक्सर हमारे घर आया जाया करते थे। उनकी कुसंगति में पड़ कर रितेश छिप छिपकर सिगरेट पीने लगा था। उसे अश्लील साहित्य और अश्लील फिल्मों का चस्का लग गया था। मैं ने मम्मी पापा से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन उनकेे कानों में जूं तक नहीं रेंगी, डांटना तो दूर, एक शब्द भी उन्होंने उसे नहीं कहा, नतीजा यह हुआ उसका मन और बढ़ गया, स्कूल में बदमाशी करना, मारपीट करना, लड़कियों से छेड़खानी करना, क्लास से भागना उसकी आदत में शुमार हो चुका था। कहने का तात्पर्य यह है कि वह धीरे-धीरे हाथ से निकलता चला गया। मैं भी समझ गई कि कुछ कहना सुनना व्यर्थ है, अतः सिर्फ अपने काम से काम रखने लगी। उसके आवारा दोस्तों की गंदी नजर मुझ पर भी पड़ती थी किंतु किसी की हिम्मत नहीं हुई मुझसे कुछ कहने की क्योंकि सब जानते थे कि मैं किस तरह की लड़की हूं। सबकी नजरों में निहायत ही शरीफ मगर मुझसे ग़लत हरकत करने वालों के लिए उतनी ही कठोर थी जिसका एक दो नमूना मैंने दिखाया भी था।

खैर उसके बारे में विस्तार से बाद में बताऊंगी। फिलहाल तो उसी तरह नंगे पड़े दादाजी के मुख से मेरी मां की छिनाल पन की बातें सुनने में हम सब लीन थे। उनकी बातें सुन कर मुझे बीती बातें याद आने लगी। जब से मैं ने होश संभाला तब से कई बार मैंने अपनी मां को दादाजी के कमरे से अस्त व्यस्त हालत में निकलते देखा था किन्तु कभी मैं ने उनके बीच इस तरह के संबंध की कल्पना भी नहीं की थी। कभी दादाजी को किचन से निकलने के बाद मां के लाल चेहरे को किचन में देखा था। इधर दादाजी बता रहे थे, “लक्ष्मी को अब अलग अलग लंड का मज़ा मिल गया था। उसे भी जब मौका मिलता था आ जाती थी हमारे कमरे में और सीधे मेरा लंड पकड़ लेती थी। बीच बीच में हफ्ते दो हफ्ते में जब केशव आ जाता था तो लक्ष्मी लाज शरम छोड़ कर मेरे सामने ही इसका लंड पकड़ लेती थी और बोलती थी, “बाबूजी, इतने दिनों बाद आए हैं, मेहमान नवाजी का मौका दीजिए ना।” केशव ठहरा एक नंबर का चुदक्कड़, “वाह बिटिया वाह, यह हुई न बात, तुझे तो देखते ही मेरा लौड़ा फनफना जाता है। आजा मेरी मेहमान नवाजी कर।” फिर शुरू होता था धमाधम चुदाई। उसकी हालत ऐसी थी कि जब हममें से कोई नहीं मिलता था तो किसी से भी चुदवा लेती थी। इसका पता मुझे तब चला जब एक हफ्ते के लिए मैं गांव गया था और अचानक दोपहर में वापस आया तो दरवाजा के बाहर एक जोड़ा फटा पुराना मैला कुचैला चप्पल पड़ा था। दरवाजा अंदर से बंद था। मैं ने दरवाजा खटखटाया तो काफी देर बाद दरवाजा खुला और दरवाजे पर अस्त व्यस्त हालत में लक्ष्मी खड़ी थी बाल बिखरे हुए थे। वह सिर्फ एक नाईटी पहने हुए थी। साफ पता चल रहा था कि अंदर कुछ नहीं पहनी हुई थी। “अरे बाबूजी आप?” अपने होश संभालती हुई घबराए आवाज में बोली।

मुझे संदेह हुआ, मैं ने चारों तरफ नजर घुमाया, कोई नहीं दिखा। “इतनी देर क्यों लगा दरवाजा खोलने में बहु?” मैं पूछा।

“जी वो मैं बाथरूम में थी। आप बैठिए ना। मैं अभी पानी लाई,” कहते हुए किचन में गई। मैं तुरंत बाथरूम गया, बाथरूम सूखा था। फिर मैं हर कमरे में झांका, कहीं कोई नहीं था। जैसे ही मैंने बेडरूम में बेड के नीचे देखा तो भौंचक रह गया। बेड के नीचे इस इलाके का काला कलूटा पागल भिखारी नंगे बदन, सिर्फ फटा हुआ हाफ पैंट पहना हुआ छिपा हुआ था।

“बाहर निकल साले हरामी” मैं चीख पड़ा। इधर डरते डरते वह भिखारी बाहर निकला। उस दुबले पतले, करीब तीस पैंतीस साल का, साढ़े चार फुटिया नाटे गंदे भिखारी को देख कर मैं ताज्जुब कर रहा था कि भगवान जाने इस पागल भिखारी में लक्ष्मी ने क्या देखा था, जबकि लक्ष्मी अच्छी खासी साढ़े पांच फुट की बेहद सुंदर, गोरी और सेक्सी औरत थी। बिखरे गंदे खिचड़ी बाल और बेतरतीब झाड़ियों की तरह लंबी दाढ़ी के साथ पिचके गाल, अपने काले रंग के अनुसार उस पागल भिखारी का नाम कालू था। उसका हाफ पैंट सामने से तंबू बना हुआ था। एक तरफ उसका मैला कुचैला फटा पुराना बनियान फर्श पर पड़ा हुआ था। साफ साफ पता चल चल रहा था कि यहां चुदाई का कार्यक्रम शुरू होने वाला था।

“बहु, जल्दी इधर आ साली कुतिया।” मैं ने बहु को आवाज दी। लक्ष्मी डरते डरते बेडरूम में आई। “साली हरामजादी बुर चोदी, और कोई नहीं मिला चुदवाने के लिए। यही पागल भिखारी मिला?” मैं गुस्से से बोला।

रंगे हाथ पकड़ाने के बावजूद वह बड़ी बेशरमी से बोली, “और क्या करती मैं? आप लोगों ने ही तो मुझे रंडी बनाया है। मुझे लंड का चस्का लगा दिया। आप लोगों ने ही तो मेरी आदत खराब की है। अब आप लोग नहीं रहिएगा तो मैं अपने शरीर की गर्मी का क्या करूं, बताईए?”

मुझे उस पर तरस आया और बोला, “ठीक है बहु ठीक है, मगर तुझे यही पागल मिला था?”

मेरे नरम पड़ने पर वह थोड़ी हिम्मत से बोली, “बाबूजी, मुझे लगा कि इस पागल के साथ ये सब करना ज्यादा सुरक्षित है। यह किसी से कुछ बोलेगा भी नहीं।”

“तू तो बहुत चालाक हो बहु। पर तूने इसे फंसाया कैसे?” अब मैंने गुस्सा थूक कर मजा लेते हुए पूछा।

थोड़ी झिझकते हुए वह बोलने लगी, “बाबूजी यह रोज इधर भीख मांगने आता था। दिमागी तौर से यह पागल है मगर खतरनाक नहीं। आज तक इसने किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया है। यह दरवाजे पर आकर बैठ जाता था और रोटी या खाने की कोई भी चीज मिलने पर यहीं बैठ कर खाता था और चला जाता था। इधर आप लोग नहीं रहने के कारण मैं तड़प रही थी और बड़ी परेशान थी कि अपने शरीर की गर्मी कैसे शांत करूं। आज जब वह रोज की तरह दरवाजे पर आया और आवाज लगाया, “मां जी कुछ खाने को मिलेगा?” मेरे दिमाग में एक आईडिया आया और मैं जोर से बोली, “थोड़ा रुको मैं अभी आती हूं,” और तुरंत अपना ब्रा और पैंटी उतार के नाईटी पहन ली। नाईटी के ऊपर के दो बटन खोल दी ताकि थोड़ा सा झुकने पर ही सामने से मेरी चूचियां नंगी हो कर दिखने लगे। इसी तरह कमर से नीचे के बटन भी खोल दी कि थोड़ा सा पैर फैलाने पर सामने से मेरी चूत भी दिखाई दे। फिर मैं दरवाजा खोल कर उसे अंदर आने को बोली। वह अंदर आया तो मैंने उसे बैठने के लिए कहा। जब वह बैठ रहा था तो मैंने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। वह चुपचाप नीचे फर्श पर बैठ गया। जब वह बैठा तो मेरी नज़र उसके पैंट से झांकते लंड पर पड़ी जिसे देखते ही मैं गनगना उठी। पैंट के अन्दर यह कुछ नहीं पहना था और इसका लंड स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। मैं रोटी ला कर उसके सामने प्लेट में डालने के लिए झुकी तो सामने से खुली नाईटी से झांकते मेरी चूचियों पर कालू की नज़रें पड़ीं और वहीं जम गई। मैं ने महसूस किया कि इसका लंड खड़ा होने लगा है। मैं अब अपने पांव थोड़ा फैलाई तो मेरी चूत के सामने से नाईटी का पर्दा हट गया और मेरी चूत भी सामने से साफ साफ दिखाई देने लगी। जब प्लेट में रोटियां देखने के लिए सिर झुका रहा था तो इसकी नजर मेरी खुली चूत पर पड़ी, इसकी नजरें मेरी चूत पर ही जम गयीं। मैं इसी के चेहरे की प्रतिक्रिया देख रही थी। इसका आधा तना लंड और तनने लगा। मैं समझ गई कि इसे पटाने में कोई समस्या नहीं होगी। फिर इसने सिर उठाकर मुझे देखा तो मैं मुस्कुरा उठी। पता नहीं इसने कभी किसी को चोदा था या नहीं। जितनी देर यह खाता रहा, मैं इसे अपनी चूचियां और चूत दिखाती रही।

खाना खाने के बाद मैं ने इसके हाथ धुुलवाया और पूछा “और कुछ चाहिए?” यह असमंजस में चुपचाप मुझे देख रहा था। मैं ने इसका हाथ पकड़ा और बोली, “चलो अंदर, मैं तुम्हें कुछ और भी दूूंगी।” यह यंत्र चालित पालतू कुत्ते की तरह मेरे साथ बेडरूम में आ गया। “बेेड पर आराम से बैठ जाओ।” मैं ने कहा। यह आराम से बेड पर बैठ गया। मैं भी आ कर इससे सटकर बैठ गई। पता नहीं कितने दिनों से नहाया नहीं था, इसके गंदे शरीर से पसीने की दुर्गन्ध भी आ रही थी मगर मुझे उसकी परवाह नहीं थी, मेरा उद्देश्य तो सिर्फ एक ही था, उसके लंड से अपनी चूत की आग बुझाना। उस समय इसके शरीर की बदबू भी मुझे अच्छी लग रही थी। मैं ने इसके हाथों को अपनी चूचियों पर रखा तो यह अपने आप मेरी चूचियों को सहलाने और दबाने लगा। नाईटी के ऊपर वाले बटन तो खुले ही थे, जिस कारण वह आसानी से हाथ घुसा कर मेरी चूचियों को मसलने लगा। मैं उसके फटे हुए हाफ पैंट में हाथ डाल कर उसके लंड को सहलाने लगी, तभी आपने दरवाजा खटखटा कर पूरा मजा किरकिरा कर दिया। मैं झट से कालू को बिस्तर के नीचे घुसा कर दरवाजा खोलने आ गई।”

“मतलब तू इससे चुदने को तैयार हो चुकी थी। चलो कोई बात नहीं। अब जब इतना कुछ हो चुका है तो बाकी काम भी कर ही लो। बेचारे कालू को क्यों तरसता छोड़ोगी। जहां से मैंने डिस्टर्ब किया वहीं से शुरू हो जा, मैं बैठ कर पहले देख देख कर मजा लूंगा फिर तुझे चोदूंगा।” मैं ने कहा और बेडरूम के कोने में रखी कुर्सी पर बैठ गया। मेरी ओर से हरी झंडी मिलते ही लक्ष्मी खुश हो गई और झट से कालू के साथ बिस्तर पर बैठ गयी। कालू भी खुश हो गया और दोनों हाथों से लक्ष्मी की नाईटी में हाथ डालकर चूचियों को पकड़कर दबाना शुरू किया। लक्ष्मी भी उसके पैंट में हाथ घुसा कर उसके लंड को सहलाने लगी। धीरे धीरे कालू का लंड टाईट होने लगा और उसका सोया हुआ लंड तनतना कर खड़ा हो गया। ऐसा लगता था कि कालू ने किसी औरत को आज तक नहीं चोदा था, इसलिए उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ, वह बेचैनी से कसमसा रहा था। इतना तो जरूर था कि उसके लंड को सहलाने से उसे बहुत मज़ा आ रहा था, मगर उसके आगे क्या? वह जोश में आ कर अचानक लक्ष्मी की चूचियों को जोर जोर से दबाने लगा। लक्ष्मी आह ओह कर रही थी। कालू भी आह आह कर रहा था। लक्ष्मी पागल हो रही थी, उसने अपनी नाईटी पूरी तरह खोल कर फेंक दी। ऐसी नंगी औरत कालू ने पहले कभी नहीं देखा था। वह घूर घूर कर उसकी पनियायी चूत को देखने लगा। इधर गरमाई हुई लक्ष्मी बेकरारी से उसकी पैंट को खोलने लगी। कालू की कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन वह भी बेचैनी से अपनी पैंट से आजाद होने के लिए मचल उठा। जैसे ही कालू का पैंट खुला, लक्ष्मी का होश गुम हो गया। मैं भी चकित रह गया। कम से कम दस इंच लम्बा और चार इंच मोटा लंड काले नाग की तरह फनफना कर खड़ा था। मैं समझ गया कि आज लक्ष्मी की चूत का बाजा बजने वाला है। लक्ष्मी हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ गई, “हाय राम इतना बड़ा लंड, नहीं नहीं मैं नहीं चुदवाऊंगी। ये तो मेरी चूत फ़ाड़ देगा।”

मगर मैं गुस्से से बोला, “साली हरामजादी, चुदवाने के लिए कालू को तू खुद लाई है और अब इसका लंड देख कर तेरी गांड़ फट रही है। कालू, छोड़ना मत इस कुतिया को, फाड़ दे इस बुर चोदी की बुर।” मैं उठा और लक्ष्मी को बिस्तर पर पटक दिया।

“नहीं नहीं छोड़ दीजिए मुझको प्लीज।” वह रोने गिड़गिड़ाने लगी।

“चुप साली चूत मरानी कुत्ती, अब देख क्या रहा है मादरचोद। चल इसकी चूत का बाजा बजाना शुरू कर।” मैं गुस्से में बोला। लेकिन कालू को क्या पता था कि चुदाई कैसे की जाती है।

मैं जबरदस्ती लक्ष्मी के पैरों को फैला कर उसकी चूत दिखा कर कालू से बोला, “ये है इस कुतिया की चूत और ये है तेरा लंड,” उसके लंड को पकड़ कर लक्ष्मी के ऊपर खींचा। “अब अपना लौड़ा इसकी चूत में घुसा” कहते हुए उसका लंड लक्ष्मी की चूत के मुहाने पर रखा। कालू लक्ष्मी के ऊपर चढ़ चुका था और लक्ष्मी की चूत में लंड घुसाने की कोशिश करने लगा। उसका सुपाड़ा छेद में नहीं घुस रहा था, इधर उधर फिसल रहा था। फिर अचानक ही उसके लंड का सुपाड़ा ठीक जगह पर टिका और जैसे जैसे कालू दबाव बढ़ाने लगा, लक्ष्मी की चूत फाड़ता हुआ उसका गधे जैसा लंड अंदर घुसने लगा। लक्ष्मी ने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो मैं ने उसका मुंह बंद कर दिया।

“चीखना मत हरामजादी, वरना टेंटुआ दबा दूंगा।” उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उधर कालू को तो मानो स्वर्ग का द्वार मिल गया था। धीरे धीरे पूरा लंड पेल दिया और फिर तो वह जानवर बन गया। उसे चूत का स्वाद मिल गया था, ठीक उस बेजुबान कुत्ते की तरह जिसके लपलपाते लौड़े को किसी कुतिया की चूत मिल गई हो। फिर तो वह लक्ष्मी की गांड़ के नीचे हाथ डाल कर कुत्ते की स्पीड से दनादन चोदना चालू कर दिया। कुछ ही देर में जब दर्द कम हुआ तो लक्ष्मी भी नीचे से गांड़ उठा उठा कर मज़े से चुदवाने लगी और रोना गाना बंद कर के मस्ती में भर कर बोलने लगी, “आह कालू, ओह राजा, चोद राजा, आह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह।” कालू बिना कुछ बोले कुत्ते की तरह घपाघप मशीन की तरह चोदने में लगा रहा। करीब दस मिनट में ही लक्ष्मी झड़ने लगी, “आ्वा्हा्आ्आ्आह्ह्ह” करते हुए निढाल हो गई, मगर कालू कहां छोड़ने वाला था, जैसे ही वह निढाल होकर पलटने लगी, उसने उसके पलटते ही पीछे से पकड़ लिया और चूत के छेद का पता तो चल ही गया था, मजा भी जान गया था, पीछे से ही कुत्ते की तरह चढ़ कर जो चुदाई शुरू किया कि लक्ष्मी हाय हाय कर उठी और फिर से कुतिया की तरह गांड़ उठा उठा कर चुदवाने लगी। कालू तो मानो जंगली जानवर ही बन गया था। लक्ष्मी के गालों को अपने दांतों से काट काट कर पहले ही लाल कर दिया था, पीछे से चूचियों को निचोड़ने लगा। ताज्जुब की बात थी कि लक्ष्मी पागलों की तरह इस सबका मज़ा ले रही थी। करीब चालीस मिनट तक पटक पटक कर कुत्ते की तरह चोदने के बाद जिंदगी में पहली बार खलास होने लगा ओर ऐसा ज़ोर से लक्ष्मी को जकड़ लिया मानो उसके अंदर घुस ही जाएगा। एकदम किसी जानवर की तरह वह डकारते हुए पूरा एक मिनट तक अपने लंड का रस उसकी चूत में डालता रहा। इस पूरी चुदाई के दौरान लक्ष्मी कुल तीन बार झड़ी। लक्ष्मी का तो पूरा शरीर निचोड़ डाला था। कालू पूरा पसीने से लथपथ हांफते हुए खलास हो कर जैसे ही एक तरफ लुढ़का, मैं ने देखा कि लक्ष्मी की चूत फूल कर भैंंस की चूत जैसे हो गई थी। लक्ष्मी का पूरा शरीर खुद का और कालू का बदबूदार पसीने से भीग चुका था। मुझे अब उसकी चूत चोदने के बदले उसकी गांड़ चोदने की इच्छा होने लगी। मैं इनकी चुदाई के दौरान ही गरमा गया था और अपना कपड़ा खोल कर तैयार था कि जैसे ही कालू चोद कर हटेगा, मैं इस कुतिया पर चढ़ जाऊंगा। जैसे ही कालू हटा, बिना देर किए लक्ष्मी के पीछे से सवार हो गया और, लक्ष्मी मना करती रही मगर मैं सीधे अपना टन टन करता लंड उसकी गांड़ में एक ही बार में ठोक दिया और करीब बीस मिनट तक जम के उसकी गांड़ का भुर्ता बनाता रहा। इस बीस मिनट के अंदर ही कालू का लंड दुबारा टाईट हो गया और अब उसने देख लिया था कि उसकी गांड़ के छेद में भी लंड डाल कर चोदा जा सकता है, जैसे ही मैं खलास हो कर लक्ष्मी पर से हटा, कालू दुबारा उस पर चढ़ गया, मगर इस बार उसकी गांड़ का भुर्ता बनाने।

“नहीं कालू नहीं,” लक्ष्मी चीख पड़ी, “अरे मादरचोद मेरी गांड़ फाड़ डालोगे क्या?” कालू को क्या परवाह थी। वह तो भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ा और एक ही जोर के झटके में उसकी चुदी चुदाई गांड़ में अपना गधा लंड पेल दिया।

“अरे फाड़ दिया रे मादरचोद मेरी गांड़, ओह साले कुत्ते हट हाय हाय,” चीखती रही मगर उस पागल पर क्या असर पड़ने वाला था। एक बार लंड घुसाने की देर थी कि दे दनादन लक्ष्मी की गांड़ की कुटाई करने लगा। ठीक किसी कुत्ते की तरह कभी दाहिना टांग चढ़ा कर चोदता तो कभी बांया टांग चढ़ा कर चोदता रहा और इस बार तो और गज़ब ही कर दिया, पूरे पचास मिनट तक पागलों की तरह नोचते खसोटते रौंदते भंभोड़ते जो चोदा कि लक्ष्मी की हालत देखने लायक थी। जब वह उसकी गांड़ चोद कर अपना लंड निकाला तो कालू के लंड पर पीला पीला मल लिथड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि लक्ष्मी की अंतड़ियों को साफ करते हुए बाहर आया था। उसकी गांड़ का छेद भी बढ़ कर खुला खुला दिखाई दे रहा था और गांड़ से होकर जांघों तक कालू के लौड़ा रस से भीगा पीला पीला मल बह निकला था। लक्ष्मी कालू का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बाथरूम में जा घुसी। जल्दी ही धो धा कर दोनों बाहर आए। इस पूरे नज़ारे को देख कर मुझे खूब मज़ा आया।

“शाबाश कालू, आज तूने कमाल कर दिया। साली रंडी की चूत और गांड़ का अच्छा बाजा बजाया। मजा आ गया,” मैं ताली बजाते हुए बोला।

लक्ष्मी को चिढ़ाते हुए बोला, “साली हरामजादी रंडी, तुझे ठीक ऐसा ही चुदक्कड़ चाहिए था। अब आया ना मज़ा?”

लक्ष्मी भी कम छिनाल थोड़ी थी, वह साली हरामजादी बुर चोदी थक कर चूर हो गई थी मगर मुस्करा कर बोली, “आह मजा आ गया बाबूजी। आज तक मुझे ऐसा मजा पहले कभी नहीं मिला था। क्या गजब का लंड है इसका। इतने सारे मर्दों में आज तक इतना जबरदस्त चुदक्कड़ नहीं मिला था।”

“इतने सारे मर्दों का क्या मतलब है? सच सच बता रे रंडी, अशोक, हरिया, केशव और मेरे अलावा और कितने लोग हैं जिन्होंने तुझे चोदा है।” मैं गुर्रा कर पूछा।

उसे तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने दांतों से अपनी जीभ काट ली। “हाय राम मैं यह क्या बोल उठी” उसके मुंह से निकला। फिर भी हिम्मत जुटा कर बोली, “आप लोगों ने ही तो मुझे बर्बाद किया। पहले हरिया ने मेरी नादानी का फायदा उठाकर मुझे चोदा। आप लोगों के लिए तो बस एक बहाना मिल गया और उसी का फायदा उठाकर मुझे चोदने लगे और पराए मर्दों के लंड का चस्का लगा दिया। असल में तो लड़का पैदा करने का सिर्फ़ बहाना था। सच तो यह है कि आप लोग मुझे चोदने की फिराक में ही थे। आप और बड़े बाबूजी ने मुझे रंडी बनाने में कोई कसर छोड़ी थी क्या? मुझे पराए मर्दों के लंड का चस्का आप ही लोगों ने लगाया था ना? मुझे तो आप लोगों से चुदने के बाद कामिनी के पापा के साथ चुदने की इच्छा ही मर गई थी। आप लोगों के नहीं रहने पर जब मुझे चुदने की इच्छा होती थी तो मैं पागल हो जाती थी। मैं क्या करती? आप ही बताईए? आस पड़ोस के भूखे मर्द मुझे खा जाने की नजरों से देखते रहते थे, मगर आप लोगों से चुदने के पहले मैं किसी और मर्द को घास भी नहीं डालती थी। मगर आप लोगों ने मेरे अंदर चुदाई की भूख को इतना बढ़ा दी थी कि मेरे लिए अब सभी मर्द बराबर हो गये थे।”

“अच्छा बाबा अच्छा, अब मुझे कुछ नहीं पूछना है। अगर तुझे बताना है तो बता, तेरी मर्जी, वरना कोई बात नहीं।” मैं नरमी से बोला।

अब वह थोड़ी खुल गई और बोली, “ठीक है, अगर आप सुनना चाहते हैं तो सुनिए। सच बात बोलूं तो मुझे खुद पता नहीं कि अब तक कितने लोगों नें मुझे चोदा है।”

“क्या मतलब, तुझे पता ही नहीं कि कितने लोगों ने तुझे चोदा है?” मैं अकचका गया।

“हां यह सच है” वह बोली।

अबतक हम सब उसी तरह नंग धड़ंग बैठे हुए थे, कालू भी चुपचाप उसी तरह पालतू कुत्ते की तरह नंग धड़ंग वहां खड़ा था और हमारी बातें सुन रहा था।

“अबे साले तू अब तक यहां खड़ा क्या कर रहा है। अपने कपड़े पहन और दफा हो यहां से।” मैं कालू को डांटा। लक्ष्मी तुरंत बोल उठी, “ठीक है कालू तू अभी यहां से जा। बहुत मजा दिया राजा। आज से तू भी मेरे तन का भोग लगाने आते रहना।” कालू आज्ञाकारी कुत्ते की तरह सिर हिलाता हुआ अपने कपड़े पहन कर चुपचाप चला गया। उसके चेहरे से साफ मालूम हो रहा था कि अभी उसका मन नहीं भरा है। लेकिन फिर आने के निमंत्रण को समझ गया था।

“हां, अब तू सुना।” मैं लक्ष्मी से बोला।

“तो मैं कह रही थी कि आस पड़ोस के मर्द मुझे भूखी नजरों से घूरते रहते थे। अब जबकि आप लोगों ने मुझ पर पराये मर्दों से चुदवाने का नशा भर दिया था तो मैं सोचने लगी कि ये जो मर्द मुझे भूखी नज़रों से घूरते रहते हैं, उन्हें क्यों वंचित रखूं, उनकी भूख मिटाते हुए अपनी भी भूख मिटाने में क्या हर्ज है। यह शुभ काम शुरू हुआ हमारे घर में दूध देने वाले ग्वाले से। वह पैंतीस चालीस साल का लंबा चौड़ा छः फुटा ग्वाला शंभू रोज़ सवेरे दूध देने आता था और मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को घूरता रहता था। एक दिन ऐसा हुआ कि मैं रात भर चुदासी के मारे तड़पती रही। संयोग से उस दिन घर में न आप थे और न ही कोई और। ग्वाला शंभू थोड़ी देर से दूध देने आया, तब तक बच्चे स्कूल जा चुके थे और कामिनी के पापा भी औफिस जा चुके थे। मैं मौका अच्छा देख कर दूध का बर्तन लेने किचन में गई और फटाफट ब्रा पैंटी खोल कर आज की तरह ही नाईटी के ऊपर और नीचे के बटन खोल कर दरवाजे पर आई। ऊपर से मेरी चूचियां आधे से ज्यादा बाहर झांक रही थीं। शंभू जब मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को इस तरह खुला देखा तो देखता ही रह गया। उसकी धोती के अंदर उसका लौड़ा खड़ा होने लगा। मैं समझ रही थी। दूध का केन नीचे रखा हुआ था। जब वह दूध निकालने के लिए झुका तो मैं ने अपने पैर जरा सा फैला दिया जिससे मेरी चूत भी दिखाई देने लगी। जैसे ही उसने सिर उठा कर मेरी चूत को इतने सामने से खुला देखा तो मेरे चेहरे की ओर देखा। मैं मुस्कुरा उठी। वह सब माजरा समझ गया और उसकी आंखें भूखे भेड़िए की तरह चमक उठी। बिना कुछ बोले मैं दूध लेकर पलटी और अंदर की ओर चली। मेरे पीछे पीछे शंभू भी अंदर घुस आया और धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

मैं किचन में दूध का बर्तन अभी रखी ही थी कि पीछे से आकर शंभू ने मुझे पकड़ लिया और बोला, “आज मौका मिला है रानी। बहुत तड़पाई हो।” कहते हुए मेरी चूचियां मसलने लगा और मेरी चूत सहलाने लगा।

मैं झूठ मूठ का ड्रामा करने लगी, “छोड़ हरामी, ये क्या कर रहे हो?”

“ड्रामा मत कर रानी। हम सब समझते हैं। आज तुझे अपने लौड़े का कमाल दिखाए बिना नहीं छोड़ेंगे।” कहते हुए मेरी नाईटी खोल कर किचन में ही नंगी कर दिया और अपनी धोती उतार कर खुद भी नंगा हो गया। उसका आठ इंच का लंड फनफना रहा था। वहीं पर मुझे झुका कर पीछे से मेरी चूत में अपना लंड ठोंक दिया।

“हाय हरामी मादरचोद, यह क्या किया। छोड़ मुझे, आह आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” मैं छटपटाने का नाटक कर रही थी।

“साली रंडी, चुप, आज तो मौका मिला है इतने दिन बाद। खूब तरसाई हो। चोदने दे।” कहते हुए उसी अवस्था में जो चुदाई चालू किया कि पूछो ही मत। मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को जी भर के दबाता रहा, नोचता रहा, निचोड़ता रहा। करीब बीस मिनट तक खूब जम के चोदा और मुझे भरपूर मजा देकर चला गया। फिर तो जब भी वह आता और घर खाली पाता तो बिना चोदे नहीं छोड़ता है। मैं भी बहुत खुश होती हूं। उसी तरह हमारा पेपर वाला भी मुझे चोदने लगा। एक दिन पेपर का बिल पेमेंट के लिए आया था तो मैंने उसे दूसरे दिन आने को कहा क्योंकि उस वक्त घर में काफी लोग थे। मैं ने दूसरे दिन उसे तब बुलाया जब मुझे पता था कि उस वक्त घर में कोई नहीं होगा। मैं ने उसे ठीक उसी तरह ललचा कर फंसाया जिस तरह दूध वाले को फंसाया था। उसने पहली बार मुझे सोफे पर ही चोदा। उसके बाद तो जब भी मौका मिलता आ जाता और चोद कर चला जाता है। हमारे घर से कुछ दूर शर्मा जी रहते हैं, वे भी मुझे काफी दिनों से घूरते रहते थे। एक दिन मेरे पति से किसी काम के सिलसिले में मिलने आए थे तो मैंने मौका ताड़ कर उसे फंसाया। में ने उन्हें चाय पी कर जाने के लिए कहा और उसी तरह खाली नाईटी पहन कर चाय देने आई और फिसलने का बहाना करके उसकी पैंट पर ठीक लंड के ऊपर चाय गिरा दिया।

“हाय राम ये क्या हुआ” कहते हुए झट से चाय गिरने की जगह पर भीगे कपड़े से रगड़ने लगी। “इससेे कपड़े पर चाय का दाग नहीं रहेगा” कहते हुए मैं ने महसूस किया कि उनका लंड खड़ा हो गया है। फिर क्या था, मैं ने पैंट के ऊपर से ही उनका लंड पकड़ लिया। शर्मा जी तो कई दिनों से मेरी ओर से सिग्नल मिलने का इंतजार ही कर रहे थे। झट से मुझे दबोच लिया और लगे दनादन चूमने।

“हाय रानी, कई दिनों से तुझे चोदने की केवल कल्पना करता था। आज मौका मिला है। तेरी चूचियां गज़ब की हैं रानी। जब तू चलती है तो तेरी गांड़ दिल में छुरियां चला देती हैं रानी।” वह बोल रहा था।

“तो अब अपने मन की कीजिए ना राजा। मैं तो भी तो कई दिनों से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी।” मैं बोली। मेरी बात सुनकर तो वह पागल हो गया। फटाफट पहले मुझे नंगी किया और खुद भी नंगा हो गया। मेरे नंगे बदन को देख कर वह पलक झपकाना भी भूल गया। फिर अचानक मानों जैसे नींद से जाग उठा और मुझ पर टूट पड़ा। मेरी चूचियों को चूसने लगा, मेरे चूत में उंगली डाल कर अंदर-बाहर करने लगा और चूत रस से सनी उंगली को मेरी गांड़ में भोंक कर रसीला कर दिया। फिर मझे झुका कर पीछे से मेरी गांड़ में अपना सात इंच का लंड एक ही झटके में उतार दिया। मैं मदहोशी के आलम में आंखें बंद किए आह आह करने लगी। वह उंगली से मेरी चूत चोद रहा था और मेरी गांड़ में लंड डाल कर दनादन अंदर-बाहर धकमपेल किए जा रहा था। मुझे चोद कर बहुत खुश हुआ और मुझे भी खुश कर दिया। अब जब भी मौका मिलता है, या तो वह आ जाता है और चोद लेता है या उसका घर खाली होने पर मैं किसी बहाने से वहां जाकर चुदवा लेती हूं।

एक बार तो गजब ही हो गया। आपको याद है, कि तीन साल पहले मेरी चाची की मृत्यु हो गई थी, जिसके यहां मैं अपने पति के साथ गई हुई थी। जब हम लौट रहे थे तो चूंकि पिछले पांच दिनों से मैं अपनी चूत की प्यास नहीं बुझा पाई थी इसलिए मैं चुदने के लिए तड़प रही थी। लौटते समय हम अंबाला स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। इंतजार करते समय बार बार मेरा हाथ मेरी चूत की तरफ अनायास ही चला जाता था और मैं हल्के से चूत सहला देती थी। चल रही थी तो दोनों जांघों को आपस में रगड़ रही थी। बेंच पर बैठी थी तो टांग पर टांग चढ़ा कर कसमसा रही थी। सावन के महीने में कांवड़ियों की भीड़ में एक लंबा चौड़ा साधू बाबा हमारे पास खड़ा बार बार मुझे देख रहा था और मेरी स्थिति को समझ लिया था। मैं ने सर उठा कर जैसे ही उसकी ओर देखा तो वह बेहद अश्लील ढंग से मुस्करा उठा। उसकी आंखों में मैं ने वासना की भूख को पढ़ लिया था। मैं भीतर ही भीतर रोमांचित हो उठी। जब मैं पति के साथ अंबाला से ट्रेन में चढ़ी तो पलट कर देखा कि वह साधू बाबा देख रहा था मैं किस बोगी में चढ़ रही हूं। हम सेकेंड एसी बोगी में थे। ट्रेन में चढ़ने से पहले मैं ने देखा था कि जेनरल बोगी और नन एसी रिजर्व कंपार्टमेंट में लोगों की खचाखच भीड़ थी। रात करीब बारह बजे हमारी ट्रेन चल पड़ी। मैं नीचे बर्थ पर थी और ऊपर बर्थ पर मेरे पति। वे लेटते ही खर्राटे भरने लगे। मुझे पता नहीं क्या हुआ कि अचानक मेरे शरीर में चींटियां सी रेंगने लगी। पिछले चार दिनों से मैं किसी से चुदी नहीं थी। मुझे चुदाई का कीड़ा काटने लगा। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करुं। उसी समय वही दाढ़ी वाला साधू बाबा जो प्लेटफार्म पर मुझे घूर रहा था हमारे बर्थ के पास आया और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं चुदासी के आलम में बिना आगे पीछे सोचे उसे रुकने का इशारा किया और टायलेट में जा घुसी और फटाफट ब्रा और पैंटी उतार कर अपने पर्स में डाल कर बर्थ के सिरहाने रख उसके पीछे पीछे चल पड़ी। वह नन एसी रिजर्व बोगी की ओर चल पड़ा। बोगी के दरवाजे और बाथरूम के आस पास रात के एक बजे भी लोग खचाखच भरे हुए थे। सावन का महीना था और कांवड़ियों की काफी भीड़ थी। वहां सभी उम्र के मर्द एक दूसरे से सट कर कुछ खड़े थे और कुछ बैठे हुए थे। वह साधु उसी भीड़ में मेरा हाथ पकड़ कर खींच कर घुसा दिया और मुझसे सटकर खड़ा हो गया। वह साधु बाबा करीब पचपन साल का काला छः फुट लंबा मजबूत कद काठी का आदमी था। बोगी की मंद रोशनी में मैंने देखा कि मेरे दाएं बाएं कुछ जवान लड़के खड़े थे। मेरे पीछे भी अधेड़ उम्र के कुछ कांवड़िए गेरुए वस्त्र में मुझ से सट कर खड़े थे। मैं उन सबके बीच पिसती हुई वासना की आग में जल रही थी। कुछ ही पलों में मैं ने अपनी दाहिनी चूचि पर किसी के हाथ का स्पर्श महसूस किया। उसी तरह बांई चूची पर भी किसी के हाथ का दबाव महसूस करने लगी। मैं समझ गई कि मेरे दाएं बाएं खड़े लड़के मेरी चूचियों पर हाथ साफ कर रहे हैं। मैं यही तो चाहती थी, चुपचाप खड़ी रही और उनकी हरकतों का मजा लेने लगी। फिर मैंने अपनी चूतड़ पर किसी कठोर वस्तु का दबाव महसूस किया। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह और कुछ नहीं, किसी का लंड है। उसी समय मेरे सामने भी मेरी चूत के ऊपर किसी के कठोर लंड के दस्तक को मैंने महसूस किया। सर उठा कर देखा तो सामने दाढ़ी वाला बूढ़ा मुस्कुरा रहा था। पीछे कौन है यह देखने के लिए सर घुमाई तो देखा एक गुंडा टाईप मोटा मुस्टंडा अश्लील भाव से मुस्करा रहा था। मैं समझ गई कि अब ये सारे लोग मुझे यहीं भीड़ का फायदा उठाकर मेरे शरीर से ऐश करेंगे, जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार थी और उत्तेजित भी। मेरी चुप्पी को उन लोगों ने मेरी स्वीकृति मान लिया। धीरे धीरे मेरे अगल बगल के लड़कों ने मेरे ब्लाऊज के बटन खोल दिए और बिना ब्रा की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से दबाने लगे। “बड़ी मस्त माल है बे, क्या मस्त चूचियां हैं। देख कितने मज़े से चूचियां दबवा रही है,” लड़के आपस में फुसफुसाने लगे। मैं आह उह करने लगी। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगी थी। इधर पीछे वाला गुंडा धीरे धीरे मेरी साड़ी उठा कर जैसे ही देखा कि मैं बिना पैंटी की हूं, मेरी गांड़ को मसलना शुरू कर दिया और गांड़ में उंगली घुसा कर अन्दर बाहर करने लगा। “वाह तू तो पूरी तैयारी के साथ आई है रानी, क्या मस्त गांड़ है, चोदने में बड़ा मज़ा आएगा।” वह फुसफुसाया। सामने वाला बूढ़ा भी सामने से साड़ी उठा कर मेरी चूत सहलाने और उंगली घुसाने लगा। मेरे मुंह से आनन्द भरी सीत्कार निकल गई। उन लोगों ने देखा कि मैं मदहोशी के आलम में हूं तो अगल बगल वाले लड़कों ने पैंट का चेन खोल कर अपने गरमागरम टनटनाए लंड निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मैं उत्तेजना की अवस्था में उनके लंड को सहलाने और दबाने लगी। “ओह साली रंडी, जोर से दबा कुतिया, मूठ मार हरामजादी, आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” बुदबुदाने लगे। पीछे वाले गुंडे ने भी अपना लौड़ा निकाल कर मेरी गांड़ के छेद पर रखा और मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके में आधा लंड पेल दिया। मैं बड़ी मुश्किल से अपनी चीख को रोक पाई। इसी समय सामने वाला बूढ़ा भी अपनी धोती से अपना लौड़ा निकाला। मुझे उस भीड़ में पता ही नहीं चला कि उस साधु बाबा का लंड कितना बड़ा है। जब वह मेरी चूत में अपना लौड़ा डालने लगा तो मुझे अहसास हुआ कि उसका लंड गधे के लंड के जैसा मोटा है। मेरी चूत में उसका लंड जब घुसने लगा तो मैंने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो साधु बाबा अपने बदबूदार मुंह से मेरे होंठों को दबा कर चूसने लगा और मेरी चीख निकल ही नहीं पाई। मैं घुट कर रह गई। उसका लंड तो घुसता ही चला जा रहा था, लग रहा था कि कोई लंबा बांस मेरी चूत में घुस रहा हो। पूरा मेरे गर्भाशय तक लौड़ा घुसा दिया था उस हरामी बाबा ने। मैं उन चुदक्कड़ों के बीच फंस कर छटपटा कर रह गई। पीछे वाला गुंडा दुबारा झटका मार कर पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा दिया। चूंकि सामने वाला बूढ़ा मुंह मेरे मुंह से सटा कर चूम रहा था इस लिए मेरी चीख दब गई थी। अब आगे पीछे से मेरी चुदाई होने लगी और मैं मस्ती में भर कर आंखें बंद किए आह आह आह करने लगी और अगल बगल के लड़कों का मूठ मारने लगी। करीब पन्द्रह मिनट बाद पीछे वाला गुंडा अपना माल मेरी गांड़ में झाड़ कर हट गया और मेरे बगल वाला लड़का सरक कर मेरी गांड़ में अपना लौड़ा घुसा दिया। इधर सामने वाला साधू बाबा भी अपना माल मेरी चूत में झाड़ कर जैसे ही हटा, दूसरी बगल वाला लड़का सरक कर मेरी चूत में अपना लौड़ा ठोंक कर दनादन चोदने लगा। अबतक आस पास के लोगों को भी पता चल गया कि यहां क्या हो रहा है। आस पास के लोग भी इस मौके का फ़ायदा उठाने के लिए मेरे समीप आ गये। मेरे पास खड़े जितने लड़के, जवान, बूढ़े थे, सभी मुझ पर टूट पड़े। कहां तो मैं मजा लेने के लिए आई थी, वहां जा कर फंस गयी। छटपटाती हुई मैं उन सबके बीच पिसती रही, सिसकती रही। कोई मेरी चूचियां मसल रहा था, कोई चूचियों को नोच रहा था, कोई चूचियों को चूस रहा था, अपने दांतों से काट रहा था, कोई होठों को चूस रहा था, कोई मेरे गालों को काट रहा था, एक एक करके बारी बारी से मेरी चूत और गांड़ को चोद रहे थे। सब फुसफुसा कर मुझे गंदी गंदी गालियां देते हुए चोद रहे थे, “छिनाल, रंडी मां की चूत, रांड, रंडी की बेटी, कुत्ती की औलाद,” और न जाने क्या क्या। मैं सिसक सिसक कर चुदती रही। मैं छटपटाती रही मगर वहां जितने खड़े लोग थे, लड़के, जवान, अधेड़, बूढ़े, जब सब ने जबतक मुझे चोद नहीं लिया छोड़ा नहीं। जैसे ही मैं उनके चंगुल से छूटी, थकान के मारे नीचे पड़ी एक बड़ी सी गठरी पर औंधे मुंह गिर पड़ी। मेरे उस तरह धम से गिरने पर आस पास बैठे ऊंघते यात्रियों की नींद टूटी तो वे एक पल को समझ नहीं पाये कि मामला क्या है, मगर आंखें मलते हुए जब अस्त व्यस्त परोसी हुई मेरे अधनंगे सेक्सी शरीर को देखा तो उन्हें भी वहशी जानवर बनने में देर नहीं लगी। फिर क्या था, मेरी हालत आसमान से गिरे तो खजूर में अटकी वाली हालत हो गई। आस पास बैठे सारे कांवड़िए, साधु और मैले कुचैले फटे पुराने कपड़े पहने गरीब गंवई सरकते हुए मेरे करीब आ गए और मुझे चारों ओर से घेर कर जिसे जिस तरह मन किया, मेरे शरीर को भंभोड़ना शुरु कर दिया। किसी किसी ने तो मेरे मुंह में भी लंड डाल कर चोदा। मुझे तो याद ही नहीं कि उस रात कितने लोगों ने मुझे चोदा। कुछ लोग मुझे चोद कर अपने अपने स्टेशन पर उतर गये और उन स्टेशनों पर चढ़े कुछ नये यात्रियों ने भी मौके का फायदा उठाकर मुझे रौंद डाला। मुझमें विरोध करने की शक्ति भी नहीं बची थी। मैं ने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया। मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी क्योंकि अनजाने में अजनबी साधू से चुदने के चक्कर में खुद ही इस मुसीबत को निमंत्रण दे बैठी थी। उस वीभत्स और बेहद घृणित परिस्थिति में पड़ी वहशतनाक मुसीबत से छुटकारे की आशा में भूखे कुत्तों की कुतिया की तरह नुचती चुदती रही। करीब साढ़े चार बजे तक मैं नुच चुद कर अधमरी हो गई। सवेरा होने वाला था तब उन लोगों ने मुझे छोड़ा। मैं लस्त पस्त पड़ी नज़र घुमा कर देखा, सभी शराफत के पुतले बने मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दिया था हरामियोंं ने। छोटा लंड, लंबा लंड, पतला लंड, मोटा लंड और पता नहीं किस किस तरह का लंड मेरी चूत और गांड़ में घुसा मुझे अर्द्धबेहोशी तल हालत में पता ही नहीं चल रहा था। जिस बेदर्दी से मेरी चुदाई हुई थी उस कारण मेरी चूत पावरोटी की तरह फूल कर कुतिया की तरह बाहर आ गई थी। गांड़ का सुराख बढ़ कर चूहे की बिल की तरह हो गया था। चूत और गांड़ से लसलसा वीर्य बह कर मेरी जांघों से होता हुआ मेरी एड़ियों तक आ चुका था। मेरी चूचियां खुले ब्लाऊज से बाहर निकली हुई थीं। मेरी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। मेरी गांड़ और चूत बिल्कुल नंगी थी। मैं अपनी हालत देख कर बेहद शर्मिंदा हो गई और उन वासना के भूखे दरिंदों के वीर्य से सराबोर अपने शरीर की सारी शक्ति बटोर कर किसी तरह उठी और लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया। फिर उसी तरह लड़खड़ाते हुए टायलेट में जा घुसी और अपने चूत, गांड़ और पैरों को धो कर किसी तरह अपने बर्थ तक पहुंची और धम से गिर कर थकान के मारे तुुंत ही गहरी नींद में सो गई।

“लक्ष्मी उठो, कब तक सोती रहोगी” कामिनी के पापा मुझे झंझोर कर जगा रहे थे। “देखो आठ बज गया है”

मैं थकान से चूर अलसाई सी उठी तो मेरे चेहरे के लाल लाल दागों को देख कर वह चौंक उठा और बोला, “अरे ये क्या हो गया है तेरे चेहरे और गर्दन पर?”

मैं समझ गई कि यह सब रात की निशानी है। “लगता है मुझे कोई एलर्जी हुई है। देखो मुझे हल्का बुखार भी है,” मैं बोली। सच में मुझे हल्का बुखार भी था।

“ठीक है तुम आराम से सो जाओ मैं अगले स्टेशन में देखता हूं कोई दवा” वे बोले। फिर मैं बारह बजे तक सोती रही। थकान उतरी तो बुखार भी उतरा मगर मेरी चूत, गांड़ और चूचियों में मीठा मीठा दर्द अभी भी उठ रहा था। टाटा पहुंचते पहुंचते मैं बिल्कुल नोर्मल हो गई थी। उस यात्रा के बाद तो मेरी चुदाई की भूख और बढ़ गई। अब आप ही देख लीजिए मैं क्या से क्या बन गई हूं।”

उसकी पूरी कहानी सुनकर मैं समझ गया कि लक्ष्मी अब पूरी तरह कुतिया बन गई है और चूंकि इसकी शुरुआत हरिया और हम लोग पहले ही कर चुके थे इसलिए मुझे कुछ कहते नहीं बना और हमने हालात से समझौता करने में ही भलाई समझी और लक्ष्मी से कुछ नहीं कहा। तब से अब तक ऐसा ही चल रहा है।”

हम सब भौंचक हो कर दादाजी के मुंह से मेरी मां की कुतिया बनने की कहानी सुनते रहे। मैं हरिया, दादाजी और बड़े दादाजी से बोल उठी, “साले हरामियों, आखिर में मेरी मां को रंडी बना ही डाला आप लोगों ने। खैर अब आप लोग भी कर भी क्या सकते हैं। यह सब ऊपर वाले की माया है। अभी आप लोग खुद देख लीजिए, मैं आप लोगों की बिनब्याही पत्नी बन ही गई ना। मुझे तो इस बात की बहुत खुशी है कि मैं आप लोगों की सामुहिक औरत बन गई हूं। फिर भी अब, जब हम सब जान गये हैं कि मेरी मां छिनाल बन चुकी है तो मैं चाहती हूं कि मेरी मां भी जान ले कि मैं उसकी बेटी, उसी के नक्शे कदम पर चल कर उसका नाम रोशन कर रही हूं।” मैं बेशर्मी से बोली। “मैं चाहती हूं कि आप सब उसके सामने मुझे चोदें और फिर मेरे सामने ही उसकी चुदाई करें।”

एक पल के लिए वे चुप रहे फिर सबने एक स्वर से मेरी बातों का समर्थन कर दिया।

आगे की घटना अगले भाग में।

तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए,

आप लोगों की कामुक

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।