कामिनी की कामुक गाथा (भाग 22)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि मेरी मां किस प्रकार मेरे पापा की नामर्दी को अपनी सुहागरात से झेलती आ रही थी और किसी प्रकार अपनी वासना की आग को बुझाने की चेष्टा करती हुई दिन बिता रही थी। फिर उन्होंने मेरे पापा के समलैंगिक होने की बात पता चली, जिसके राजदार बड़े दादाजी थे, जिन्होंने मेरे पापा के समलैंगिक रुझान का भरपूर लुत्फ उठाया और आज तक उठाते आ रहे हैं। इसलिए मेरी मां ने मेरे पापा के समलैंगिक संबंधों की विस्तृत जानकारी देने के लिए बड़े दादाजी की ओर दृष्टि फेरी। बड़े दादाजी कुछ पल चुप रहे फिर उन्होंने बोलना शुरू किया :-

“ठीक है, अशोक के गांडूपन की बात मुझसे सुनो।” इतनी देर चुप रहने के बाद बड़े दादाजी ने मुह खोला। सब उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे।

“मैं जब दस साल पहले जमशेदपुर आया था एक शादी में शरीक होने के लिए उस समय मुझे पता चला कि अशोक को गांड़ मरवाने का बहुत शौक है और गांड़ मरवाने में उसे बहुत मज़ा आता है। वह शादी थी अशोक की ममेरी बहन रेखा की। तुम भी तो आए थे।” दादाजी की ओर मुखातिब हो कर बड़े दादाजी बोले।

“हां मुझे याद है, आगे बोलिए” दादाजी बोले।

बड़े दादाजी ने आगे बोलना शुरू किया, “अशोक उस दिन बहुत ही सुन्दर दिख रहा था। भीड़ में भी बिल्कुल अलग। उसका बदन, जैसा कि अभी लक्ष्मी ने बताया और सबको पता भी है कि बिल्कुल लड़कियों की तरह है। मुझे करीब दस दिनों से किसी औरत को चोदने का मौका नहीं मिला था। वहां जा कर लक्ष्मी को देखा कि वह बहुत व्यस्त है, किसी और औरत को फंसा कर चोदने का सारा प्रयास व्यर्थ हो रहा था, मैं बेहद व्याकुल था चोदने के लिए। किसी भी औरत को देख कर मेरा लौड़ा खड़ा हुआ जा रहा था, तभी मेरी नज़र अशोक पर पड़ी। उस दिन पता नहीं मुझे क्या हुआ कि अशोक को देख कर ही मेरा लौड़ा टाइट हो गया। अशोक भीड़ में खड़ा हो कर शादी की रस्म देखने में मग्न था। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और भीड़ को चीरते हुए ठीक अशोक के पीछे सट कर खड़ा हो गया। मेरा खड़ा लन्ड ठीक अशोक की गांड़ की दरार पर सटा हुआ था और मैं हल्के हल्के उसकी गांड़ पर दबाव दे रहा था। उसका कद करीब करीब पांच फुट छः इंच का होगा, इसलिए मैं हल्का सा घुटना मोड़ कर खड़ा ठीक उसकी गांड़ के छेद पर दस्तक दे रहा था। वह चूड़ीदार पाजामा पहना हुआ था इसलिए जरूर उसने मेरे लंड को अपनी गांड़ में चुभता हुआ अनुभव कर लिया होगा और तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने भी हौले हौले अपनी गांड़ पीछे ठेलना शुरू किया। फिर धीरे से सिर घुमाकर पीछे देखा और मुझे देख कर थोड़ा शरमा गया लेकिन उसके होंठों पर मुस्कान थी। मेरा मन बढ़ गया। मैं अपने हाथों से उसकी गोल गोल गांड़ को सहलाने लगा।

“यह क्या कर रहे हैं बड़े पापा?” वह मेरे कान में फुसफुसाया।

“अच्छा नहीं लग रहा है?” मैं उसकी कान में फुसफुसाया। वह बोला कुछ नहीं लेकिन सिर्फ सिर हिला कर जता दिया कि उसे अच्छा लग रहा है। फिर वह धीरे से दाहिना हाथ पीछे ले कर धोती के ऊपर से ही मेरा लौड़ा सहलाने लगा। मैं समझ गया कि अशोक को यह सब पसंद आ रहा है।

मैं धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, “बेटा, चलो थोड़ा बाहर घूम आते हैं।”

अशोक की सांसें बहुत जोर जोर से चल रही थीं, “चलिए” वह बोला।

जब हमलोग बाहर निकल रहे थे तो अशोक के दोस्तों में से किसी की हल्की सी आवाज सुनाई दी, “साला बूढ़ा हमारा माल खाने के चक्कर में है।” मैं अनसुना करते हुए अशोक के साथ बाहर निकल कर घर के बगल में घनी झाड़ियों के पीछे चला गया। मैं ने दिन में देखा था कि वहां घास से भरा हुआ एक छोटा सा मैदान है। वहां पहुंच कर मैंने चारों तरफ देखा, सुनसान जगह थी, चांदनी रात में वह जगह काफी महफूज थी उस काम के लिए जो मैं करने जा रहा था।

मैं सीधा उससे पूछ बैठा, “बेटा तुझे मालूम है ना हम यहां क्यों आए हैं?”

“हां बड़े पापा, मुझे खूब पता है आप क्या चाहते हैं।” वह बोला। मुझे और कुछ सुनने की जरूरत नहीं थी। मैं सीधे उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख कर उसके रसीले होंठों को चूमने लगा। उसकी छाती पर जैसे ही हाथ लगाया, ऐसा लगा मानो किसी चौदह साल की लड़की की तरह छोटी छोटी चूचियां हों। उसकी गांड़ तो मैं पहले ही पकड़ कर देख चुका था, जो किसी लड़की की तरह मस्त गोल गोल थी। मैं और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। फटाफट उसके कपड़े उतारने लग गया और वह भी मेरी धोती खोलने लगा। कुछ ही पलों में हम बिल्कुल नंगे हो गए। उसके लड़कियों की तरह शरीर को देख कर मेरा लौड़ा तो एकदम फनफना कर खड़ा हो गया। मैं धोती बिछा कर उसे लेकर सीधे जमीन पर लेट गया और उसकी चूचियां दबाने लगा। वह मस्ती में आह उह कर रहा था।

फिर मैंने अपना टन टन करता लौड़ा उसके हाथ में दिया तो एक बार तो घबरा गया, “बाप रे बाप, इतना बड़ा लंड! उफ्फ बड़े पापा, आपका लौड़ा तो बहुत बड़ा है। फाड़ ही दीजियेगा आज तो आप मेरी गांड़।”

“अरे नहीं बेटा कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो। सभी पहली बार यही कहते हैं, फिर खूब मजे से चुदवाते हैं।” मैं उसके डर को समझ कर बहलाने फुसलाने लगा। मैं जानता था कि 7″ लंबा लंड औसत से थोड़ा ही ज्यादा है लेकिन 3″ मोटा वाकई औसत से काफी मोटा है। मैं यह भी जानता था कि मीठी मीठी बातों में उलझा कर किसी तरह एक बार उसकी गांड़ में लंड घुसा लूं तो फिर धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

फिर मैंने उससे कहा, “ले बेटा मेरा लौड़ा थोड़ा मुह में ले कर चूसो, डरो मत, मजा आएगा, तुझे भी और मुझे भी।” वह मेरे लंड को मुंह में लेकर चूसने लगा। जिस ढंग से वह चूस रहा था, मैं समझ गया कि वह लंड चूसने में काफी माहिर है। जिस लंड से वह डर रहा था, उसी लंड को करीब तीन चौथाई मुंह में ले कर बहुत मज़े से चूसने लगा। आज तक सिर्फ अशोक और कामिनी ने ही मेरे लंड को इतनी अच्छी तरह से चूसा है। उफ्फ, ऐसा खूबसूरत गांड़ मैंने आज तक नहीं देखा था, उसके अलावे अगर और किसी की गांड़ इतनी खूबसूरत है तो वह है कामिनी की। इस बीच मैं उसके पैरों को फैला कर उसकी चिकनी और चमकदार गोल गोल मस्त गांड़ को चाटने लगा और उसकी गांड़ के छेद में जीभ डाल कर अंदर-बाहर करने लगा। उसकी गांड़ लड़कियों की गांड़ से भी कहीं ज्यादा सुंदर थी, बिल्कुल कामिनी की गांड़ की तरह चिकनी मक्खन की तरह। उसकी गांड़ औरउसके गांड़ के छेद को चाटते चाटते मुझे अहसास हुआ कि वह अब तक काफी लंड ले चुका है।

करीब पांच मिनट बाद मैंने उसे कुतिया की तरह चार पैरों में खड़ा किया और उसके पीछे आ गया। फिर उसकी गांड़ के छेद के पास अपने लंड का सुपाड़ा टिकाया तो उसने फिर कहा, “प्लीज आराम से डालिएगा, बहुत मोटा है आपका लौड़ा।”

“तू चिंता मत कर बेटा, तुझे पता ही नहीं चलेगा कि मेरा लौड़ा कितने आराम से तेरी गांड़ में जा रहा है।” मैं झूठ मूठ ही उसे तसल्ली देते हुए और आश्वस्त करते हुए बोला। मेरा लौड़ा तो उसने पहले ही अपने मुंह से गीला किया हुआ था और मैं भी उसकी गांड़ को गीला कर चुका था, धीरे धीरे लंड में दबाव देने लगा। जैसे ही मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गांड़ के सुराख में घुसा, उसकी आह निकल पड़ी।

मैं फिर भी रुका नहीं और दबाव बढ़ाता गया, वह दर्द के मारे छटपटाने लगा और बोला,” ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा जी दर्द हो रहा है आह धीरे धीरे प्लीज फट जायेगी ओह,” बिलबिला उठा था वह। मैं अब थोड़ा रुका, अब तक मैं आधा किला फतह कर चुका था। जैसे ही उसका छटपटाना बंद हुआ मैं पूरी ताकत से एक करारा ठाप मार कर पूरा लौड़ा उसकी गांड़ में पेल दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह मार डाला पापा आप ने ओ्ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह” किसी हलाल होते बकरे की तरह कराह उठा। मैं तो किला फतह कर चुका था। उफ्फ उसकी चुदी चुदाई गांड़ थी फिर भी मेरे लंड के लिए बहुत टाइट थी। ऐसा लग रहा था मानो उसकी गांड़ ने मेरे लंड को जकड़ लिया हो। कुछ पल मैं रुका और फिर जैसे ही मैंने देखा कि वह शांत हो गया है, मैं फिर कहां रुकने वाला था, दनादन दनादन चोदने लगा। उसकी चूचियों को कस कस के दबाने लगा और खूब मज़े से रगड़ रगड़ कर चोदने लगा।

अब उसे भी मज़ा आने लगा और वह मस्त हो कर बोलने लगा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा आह्ह्ह्ह्ह पापा, चोदिए राजा ओह चोदिए मेरी गांड़ ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां मज़ा आ रहा है”।

मैं भी मस्ती में भर कर धक्के पर धक्का लगाने लगा और बोलने लगा, “मस्त गोल गोल गांड़ है रे बेटा ओह मेरी जान आह आह मेरी चिकनी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह साले गांडू, ऐसा गांड़ आज तक नहीं चोदा।” करीब दस मिनट उसी तरह चोदने के बाद मैं ने उसे लिटा दिया और उसके दोनों पैरों को फैला कर उठाया और अपने कंधों पर चढ़ा लिया फिर उसकी गांड़ में पुनः लौड़ा पेल दिया और भकाभक चोदने में मशगूल हो गया। करीब पच्चीस मिनट तक खूब जम के उसकी गांड़ की चुदाई किया और फिर अंत में जब झड़ने का समय आया तो उसे कस के दबोच लिया और फचफचा के लंड का पूरा रस उसकी गांड़ में डाल कर खलास होने लगा। उस वक्त ऐसा लग रहा था मानो वह अपनी गांड़ से मेरा लौड़ा दबोच कर चूस रहा हो। ओह मैं बता नहीं सकता कि कितना गजब का अहसास था वह। मैं तो मानो जैसे स्वर्ग ही पहुंच गया था और वह तो जैसे पागल ही हो गया था। मुझसे लिपट गया और बोलने लगा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा, आज आपने तो मुझे निहाल कर दिया। ऐसा तो आज तक किसी ने नहीं चोदा था। मैं आपके लंड और आपकी चुदाई का दीवाना हो गया।” मुझसे ऐसे लिपट कर चूमने लगा जैसे मुझे छोड़ना ही नहीं चाहता हो।

किंतु मैं ने उससे अलग होते हुए कहा, “अरे बेटा मैं खुद भी तेरा दीवाना हो गया हूं। जबतक यहां हूं, कसम से तेरी गांड़ मारता रहूंगा। जब भी तेरे यहां आऊंगा, बिना तेरी गांड़ चोदे नहीं जाऊंगा। फिलहाल हमें यहां से चलना चाहिए, वरना कोई आ जायेगा तो हम मुश्किल में पड़ सकते हैं।” इतना कहकर हमने अपने कपड़े पहने और फिर शादी की महफ़िल में आ गए। उसी समय फिर किसी की आवाज मेरे कानों में टकराई, “खा लिया हमारा माल साला बूढ़ा।” मैं ने नजर घुमा कर आवाज की दिशा में देखा तो एक 25 – 30 साल का नौजवान हमारी ओर देख कर मुस्कुरा रहा था। मैं भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा उठा। बाद में पता चला कि वह भी अशोक की अॉफिस में काम करने वाला उसका सहकर्मी रमेश था। उस समय करीब ग्यारह बज रहे थे। शादी की रस्म पूरी होते होते एक बज गया।

एक बजे अशोक फिर मेरे पास आया और मुझ से सट कर मेरे लौड़े को धोती के ऊपर से ही सहलाते हुए बोला, “चलिए ना फिर एक बार और हो जाय, अभी तो बहुत देर है बिदाई में।” उसके हाथ लगाते ही मेरा लौड़ा फिर तन कर मेरी धोती फाड़ कर बाहर निकलने को मचलने लगा। मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसके साथ फिर उसी स्थान पर चला गया जहां हमने चुदाई का खेल खेला था। इस वक्त हम दोनों बिना एक पल गंवाए सीधे नंगे हो कर एक दूसरे से गुंथ गये और फिर एक बार वही चुदाई का दौर चालू हुआ। इस बार तो हम बेहद गंदे तरीके से खुल कर चुदाई में डूब गए थे। एक दूसरे में समा जाने की जी तोड़ धकमपेल में मग्न।

“ओह साली कुतिया, ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे लंड की रानी, गांडू साले मां के लौड़े तेरी गांड़ का गूदा निकालूं ओह ओ्ओ्ओ्ओह” मैं गंदी गंदी गालियों की बौछार कर रहा था और वह मस्ती में चुदते हुए बोल रहा था, “हाय हाय हरामी मादरचोद पापा, साले कुत्ते, मेरी गांड़ के राज्ज्ज्जा, चोद हरामजादे मेरी गांड़ का भुर्ता बना दीजिए, मझे अपनी रंडी बना लीजिए, कुतिया बना लीजिए, ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह मजा दे दे स्वर्ग दिखा दे, ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा।”

इधर हम इतने बेखबर हो गये थे कि वही व्यक्ति, जिसने हम पर कमेंट पास किया था, कब वहां आ पहुंचा हमें पता ही नहीं चला। “ओह तो साले बुढ़ऊ अकेले अकेले मज़ा लूट रहे हो? साले मादरचोद अशोक, हमारा ख्याल नहीं आया?” उसकी आवाज सुनकर हम चौंक पड़े।

अशोक तुरंत बोला, “अभी नहीं, प्लीज अभी नहीं, पहले पापा को चोदने दे फिर तुम चोद लेना।”

“ठीक है साले बुढ़ौ चोद ले चोद ले, इसके बाद मेरा नंबर है।” कहता हुआ फटाफट कपड़े खोल कर नंगा हो कर अपनी बारी का इंतजार करने लगा। करीब साढ़े पांच फुट ऊंचा गठीले बदन का युवक था वह। उसका लंड मुश्किल से साढ़े छः इंच लम्बा और दो इंच मोटा रहा होगा। जैसे ही मैं झड़ कर हांफते हुए अलग हुआ झट से रमेश मेरी जगह ले लिया और फिर उनके बीच घमासान छिड़ गया।

“साले हरामजादे मादरचोद, मुझे छोड़ कर बुड्ढे का लौड़ा खाने अकेले अकेले आ गया, ले साले मेरा लौड़ा खा” कहते हुए चोदने लगा और ताज्जुब तो मुझे यह देखकर हो रहा था कि मुझसे चुदने के बाद भी अशोक बड़े आनन्द से रमेश से भी चुदवाने में मग्न था। लेकिन रमेश सिर्फ दस मिनट में ही झड़ गया और लुढ़क गया।

“साला चोद चोद के तेरा गांड़ भी ढीला कर दिया तेरे पापा ने, सॉरी पापा जी, फिर भी मज़ा आ गया। तेरी गांड़ चोदने से मन ही नहीं भरता है। लगता है जैसे लंड डाल कर पड़े रहें।” कहते हुए वह उठा और अपने कपड़े पहनने लगा।फिर हम तीनों वापस शादी की भीड़ में आ गए। मुझे अशोक ने बताया कि यह रमेश है, उसकी अॉफिस का सहकर्मी। रमेश के अलावा और भी तीन लोग उसके अॉफिस में थे जिनके साथ उसका समलैंगिक संबंध था। उनमें एक उसके अॉफिस का पचपन साल का बॉस भी था।उस वक्त दो बज रहा था। मैं ने उससे पूछा, “तुझे गांड़ मरवाने का शौक कब से है?”

वह बोला, “जी मुझे यह शौक स्कूल के समय से है।”

मैं आश्चर्यचकित हो गया। पूछ बैठा, “कैसे शुरू हुआ यह सब?”

“ठीक है, बताऊंगा, शादी तो हो चुकी है, विदाई सवेरे है। चलिए कमरे में तब तक हम एक नींद मार लेते हैं, फिर विदाई के बाद, इत्मिनान से मैं पूरी बात बताऊंगा।” इतना कहकर उस कमरे की ओर बढ़ा जहां हम ठहरे हुए थे। हमारे साथ रमेश भी चला आया। सवेरे जब विदाई होने लगी तब किसी ने हमें उठा दिया। विदाई के बाद फिर हम अपने कमरे में आ गए। फ्रेश होकर जब हम बैठे तो मैंने कहा, “हां, अब बताओ”।

“ठीक है तो सुनिए” वह बोलना शुरू किया। हमारे साथ रमेश भी था।

इसकेे बाद की कहानी मैं अगली कड़ी में ले कर आऊंगी।

आप लोगों की कामुक लेखिका

रजनी।

Comments

Published by

Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।