कामिनी की कामुक गाथा (भाग 59)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह रश्मि, जो रेखा की ननद थी, संयोग से हमारे चंगुल में आ फंसी थी। मैंने उसकी कामुक भावनाओं को भड़का कर पहले मैंने उससे समलैंगिक संबंध बनाया, फिर क्षितिथ ने उस पर हाथ साफ किया। इतना ही नहीं, हरिया और करीम ने भी उसे बख्शा नहीं और अपनी हवस का शिकार बना बैठे। यह सब हुआ खुद रश्मि की रजामंदी से। आरंभिक ना नुकुर और नखरे के बाद, रश्मि, हरिया और करीम के साथ सामुहिक संभोग में शामिल होकर संभोग का अद्भुत सुखद अनुभव से दो चार हुई। लेकिन इस दौरान दोनों ठरकी बूढ़ों ने रश्मि की जो हालत की, देखने लायक थी। चूत और गांड़ को तो गुफा ही बना दिया था। योनि फूल कर गोलगप्पा बन गयी थी। उसकी गुदा का उद्घाटन हुआ भी तो करीम के विकराल लिंग से और क्या खूब लिंग था, खतना किया हुआ लिंग। मलद्वार का छल्ला लाल होकर कुछ बाहर निकल आया था। गालों पर, गर्दन पर और सीने पर हरिया के दांतों के लाल निशान उभर आए थे। चल भी नहीं पा रही थी ठीक से। पांव फैला कर चल रही थी बेचारी। इतना सब कुछ होने पर भी रश्मि खुश थी, संतुष्ट थी, दो दो बूढ़े हवस के पुजारियों की दरिंदगी को बखूबी झेल जो पायी। सिर्फ झेली नहीं, मजे ले ले कर झेली।इन सबके बाद क्षितिज उसे उसके भाई सिन्हा जी के घर छोड़ आया। जाते जाते दोनों बूढ़ों पर प्रशंसात्मक दृष्टि फेरती गयी, मतलब साफ था, इन दोनों बूढ़ों की तो निकल पड़ी। जब तक रहेगी, इन्हें और मौका मिलने वाला था उसे चोदने का। वैसे भी कल तो क्षितिज को वापस भी जाना था।

“तो क्षितिज बेटा, कल की तैयारी हो चुकी है ना?” जैसे ही क्षितिज रश्मि को छोड़कर वापस आया, मैंने पूछ लिया।

“ओह मॉम, जाने का मन ही नहीं कर रहा है।”

“धत पगले, जाओगे क्यों नहीं?”

“आदत खराब हो गयी है।”

“कैसी आदत?”

“औरतों की आदत।”

“मिलेगी पागल, बहुत मिलेंगी। पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, कैरियर बना। तेरा वादा याद है ना? औरतें तो मिलती ही रहेंगी। नहीं मिली तो मैं तो हूं ही तेरी बुरचोदी मां। आ जाना, इसी तरह बीच बीच में।”

“ओके मॉम, ओके। मैं भूला नहीं हूं अपना वादा। देख लेना मेरी पढ़ाई और कैरियर। आपका बेटा आपको कभी शर्मिंदा नहीं होने देगा। बस तुम इसी तरह मेरा साथ देते रहना।”

“इसी तरह मतलब?”

“मतलब क्या? हौसला अफजाई और चुदाई।”

“हौसला अफजाई तो ठीक है, मगर चुदाई के लिए इधर उधर भी नजर घुमा लिया कर मेरे बच्चे। मैं हमेशा थोड़ी न उपलब्ध रहूंगी। सीख तो गया है सबकुछ, खुद पटा कर मिटा लिया कर अपने लंड की भूख।” कोई सुनता तो कहता कितनी बड़ी छिनाल मां है जो अपने बेटे को ऐसी शिक्षा दे रही है। मगर मैं तो ऐसी ही थी उस वक्त और ऐसी ही हूं अब भी।

“वो तो ठीक है मेरी प्यारी बुरचोदी मां, लेकिन जाने के पहले आज की आखिरी रात तो जी भर के प्यार करने दोगी न।” क्षितिज बोला।

“हां रे पागल हां्हां्आं्आं्आं मेरे रसिया बेटे। जी भरके प्यार कर और प्यार दे मुझे।” कहने को तो कह गयी मैं, लेकिन नतीजा इतना भयानक होगा इसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। कयामत की रात थी वह। खाना खाने के बाद करीब दस बजे से लेकर सुबह पांच बजे तक क्या क्या नहीं किया वह मेरे साथ।

खाना खाकर हरिया और करीम तो अपने कमरों में चले गये, बूढ़े थे, एक जवान स्त्री को संतुष्ट करने की चुनौती स्वीकार करके अपनी औकात से बाहर शक्ति का प्रदर्शन कर बैठे थे। थके थके से लग रहे थे दोनों, नींद से बोझल आंखों के साथ जा दुबके अपने अपने बिस्तरों पर, लेकिन क्षितिज की आंखें तो मुझी पर ही गड़ी थीं, नींद से कोसों दूर। जानती थी अंततः नंगी होना ही है, सारे कपड़े खोलकर सिर्फ चादर ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। क्षितिज किसी भूखे शेर की तरह यथासमय मेरे कमरे में दाखिल हुआ, सिर्फ एक बरमूडा पहने। बरमूडा उसका विशाल तंबू की शक्ल अख्तियार किया हुआ था। बताने की जरूरत नहीं कि अंदर कुछ नहीं पहना था मेरा चोदू बेटा। आते न आते बरमूडा ऐसे निकाल फेंका उसने मानो शरीर पर कोई गंदी चीज पड़ी हो। उफ्फ्फ्फ मां, अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक ही खूंखार और भयावह आकार था उसके लंड का। एक झटके में मेरे ऊपर की चादर को ऐसे फेंका मानो कोई घृणित वस्तु मेरे शरीर पर पड़ी हो, और लो, मादरजात नंगा मेरा बदन, कमरे की दूधिया रोशनी में चमक उठा। क्षितिज की दृष्टि में मैं किसी भूखे भेड़िए सी चमक देखकर अंदर ही अंदर हिल उठी।

“वाह, मेरी चूतमरानी मां, वाह। यह हुई न बात।” बावला बेटा, मुझ पर टूट पड़ने को उतावलापन स्पष्ट दिख रहा था उसकी आवाज में और हावभाव में। बिना एक पल गंवाए कूद पड़ा मुझ पर और छा गया मेरी नग्न देह पर। उसके उतावलेपन से मैं घबरा ही गयी।

“ओह्ह्ह्ह्, इतनी उतावली?”

“निकाल लूंगा आज सारी कसर, उसी की उतावली है मेरी जान।”

“उफ्फ्फ्फ भगवान, सारी रात तो पड़ी है।”

“छुट्टी की आखिरी रात भी तो है मेरी प्यारी बुरचोदी मां। इसके बाद फिर अगली छुट्टी तक इंतजार करना पड़ेगा।” अपनी बांहों में मेरी नग्न देह को जकड़े चूमने लगा पागलों की तरह मुझे।

“आह आह पागल कहीं के, ओह्ह्ह्ह् आराम से।”

“आराम से? समय निकलता जा रहा है। एक एक पल कीमती है। हर पल का भरपूर इस्तेमाल करूंगा।” वहशियत उसकी आंखों में नाच रही थी। ऐसा तो नहीं था यह, अचानक इसे क्या हो गया?

“ओह्ह्ह्ह् भगवान, आज यह क्या हो गया है तुम्हें हरामी, जान निकाल दोगे क्या?” उसकी मजबूत पकड़ में पिसती हुई बमुश्किल बोल पाई। मैं दहशत में आ गयी थी उसकी पाशविकता देख कर। मेरी दोनों उरोजों को इतनी बेरहमी से मसल रहा था कि मैं बमुश्किल अपनी चीखें रोक पा रही थी। उसे धकेल कर अलग करना और उसकी दानवी पकड़ से छूटना मेरे लिए असंभव हो गया था। उसे चोट पहुंचा कर छूट सकती थी, लेकिन उसे चोट भी पहुंचाना नहीं चाहती थी। सिर्फ छटपटा कर रह गयी।

“मेरी जान की जान कैसे निकाल सकता हूँ”

“फिर यह क्या कर रहे हो आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह?”

“प्यार कर रहा हूं।”

“जानवरों की तरह? हाय ओ्ओ्ह्ह्ह्ह?”

“मैं जानवर लग रहा हूं मेरी लंडखोर मॉम?”

“हां्हां्आं्आं्आं, तू जानवर बन गया है साले मां के लौड़े।” मेरे उरोजों की बेरहमी से निचोड़े जाने की पीड़ा से गाली निकाल बैठी।

“हां मैं मां का लौड़ा हूं साली कुतिया।” वह अब और खूंखार हो उठा। गालियों पर वह भी उतर आया। मेरी चूचियों को चूसने लगा और दांतों से काटने लगा।

“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ इस्स्स्स्स्स आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। साले जंगली कुत्ते।” अपनी बेबसी पर सिसक पड़ी।

“हां मैं जंगली कुत्ता हूं।” मेरी चूचियों को नोच नोच कर लाल कर दिया। अभी मैं उस दहशतनाक परिस्थिति से गुजर ही रही थी कि उसने अचानक बड़ी बेरहमी से मेरी योनि में भक्क से उंगली भोंक दिया।

“उई्ई्ई्ई्ई्ई मां्मां्आ्आ्आ्आ।” चिहुंक उठी मैं। अचानक हुए इस हमले से मेरी चुदी चुदाई योनि भी त्राहिमाम कर उठी। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह कसाई, बेरहम, जानवर।”

“जो बोलना है बोल मेरी मां। मुझे बस खेलने दे बुरचोदी मॉम।” गुर्रा उठा वह। उसने सिर्फ उंगली घुसा कर ही बस नहीं किया, लगा भचाभच उंगली से ही चोदने।

“उफ्फ्फ्फ दरिंदे बन गये हो तुम।” तड़प कर बोली।

“हां्हां्आं्आं्आं हां्हां्आं्आं्आं, बन गया दरिंदा। सारी कसर निकालूंगा आज रात।” सुनकर कांप उठी। क्या क्या करना चाह रहा था मेरे साथ? कोई और होता तो उसकी ऐसी जालिमाना हरकत के लिए ऐसी सजा देती, जो उसे जिंदगी भर याद रहता। लेकिन यह तो मेरा बेटा था, प्रतिक्रिया में उसे तकलीफ भी नहीं दे सकती थी। सहती जा रही थी, सिर्फ मुह से बोलकर ही पीड़ा और विरोध जता रही थी, जिसका उस पर तनिक भी असर नहीं हो रहा था।

“आह ओह इतने कसाई मत बनो आह।”

“चुप, एकदम चुप, मां की चूत, कसाई लग रहा हूं?” कहते हुए सीधे अपने गधे सरीखे लिंग को मेरे मुह में ठूंस दिया और पलट कर खुद मेरी योनि से निकलते लसलसे द्रव्य को चपाचप चाटने लगा। चाटते चाटते मेरे भगनासे को दांतों से हल्के हल्के चबा भी रहा था। पीड़ा थी मगर उत्तेजना के मारे थरथरा उठी और उसी वक्त मेरा स्खलन आरंभ हो गया।

“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” गजब का दीर्घ स्खलन था वह। पीड़ा भरे आनंद से मेरी आंखें बंद होने लगी। वह समझ रहा था सबकुछ, लेकिन छोड़ा नहीं मुझे। चाटता रहा, चाटने की इस क्रिया में उसकी जीभ मेरी गुदा द्वार को भी स्पर्श करने लगी। मेरे मुंह से गों गों की आवाज निकल रही थी। उसका लंड जो घुसा हुआ था मेरे मुह में। चोद रहा था मेरे मुह को अपनी कमर चलाते हुए, गपागप, सटासट और मैं सप्रयास उसके विशाल लिंग को मुंह में समाए चूसने को वाध्य थी। तभी उसके लिंग का आकार और बड़ा होने लगा। कठोर होने लगा, मेरा दम निकलने निकलने को हो रहा था लेकिन तभी फचफचा कर उसका लिंग वीर्य उगलने लगा। गटकती चली गयी उसके वीर्य का एक एक कतरा। जैसे ही उसका लिंग नरम पड़ा, मेरी जान में जान आई। “इस्स्स्स्स्स्स्स्स्, इस्स्स्स्स्स्स्स्स्।” राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी मैं।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, पी जा, पी जा मेरे लंड का प्यार भरा रस मेरी रंडी मां्मां्आ्आ्आ्आ। दूथ का्आ्आ्आ्आ्आ कर्ज अदा कर रहा हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं।” कैसा हरामी बेटा है, मैं सोच रही थी। दूध का कर्ज, साला मादरचोद इसे दूध का कर्ज कह रहा है।

यह तो शुरुआत थी। चाटता रहा मेरी चूत और गांड़, भूखे कुत्ते की तरह। मैं मचलती रही, कुचली जाती रही उसके दानवी शरीर के नीचे। मैंने महसूस किया कि अब करीब दो तीन मिनट में ही पुनः उसका लिंग पूर्ववत सख्त हो रहा था। एक झटके में मुझे पलट दिया। उसके प्रयासों के परिणामस्वरूप मैं भी पुनः उत्तेजित हो उठी। वह जो कुछ भी कर रहा था उसमें साफ साफ पता चल रहा था कि उसे मेरी मर्जी या इनकार की तनिक भी परवाह नहीं है। सिर्फ उसे अपनी मर्जी चलानी थी, अपनी हवस की पूर्ति ही एकमात्र उद्देश्य था।

“तुझे सिर्फ अपनी मर्जी चलानी है हरामी?” मैं बोल ही पड़ी।

“हां, आज सिर्फ मेरी मर्जी चलेगी। कल तो मुझे जाना है, फिर अगली छुट्टी तक तेरे खूबसूरत तन से वंचित रहूंगा न।चुपचाप चुदती रह। करने दे मुझे अपनी मर्जी मेरी रानी मां।” कहते हुए मुझे कुतिया की पोजीशन में करके पीछे से सवारी गांठ ली उसने। मैं समझ गयी कुछ बोलना व्यर्थ है। जैसा कर रहा था वैसी होती जा रही थी। मां का प्यार भी कितना अजीब होता है। संतान की इच्छा को ठुकरा पाना कितना कठिन होता है। वैसे भी जो कुछ मेरे साथ हो रहा था, मेरे ही कर्म का फल था। झेलना ही था। रात भर कयामत की रात होनी थी। पीछे से अपने तने हुए लिंग को मेरी योनि छिद्र के द्वार पर साध कर मेरी चूचियों इतनी सख्ती से दबोचा कि मेरी चीख निकलते निकलते रह गयी और उसी पीड़ामय स्थिति में उसके तनतनाए लिंग का हौलनाक प्रहार हुआ मेरी योनि में। भक्क, और उस कसाई ने उसी झटके में सरसरा कर पूरा का पूरा लिंग मेरी योनि को ककड़ी की तरह चीरता हुआ जड़ तक उतार दिया।

“ओह्ह्ह्ह् माद्द्द्द्दर्र्र्र्र्रचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद हर्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आमजा्आ्आ्दे, कुत्ते्ए्ए्ए्ए। मर गयी रे््एए््एए््एए।” चुदी तो थी, कई बार चुदी थी, अलग लोगों से, अलग अलग तरीकों से, लेकिन ऐसी बेरहम चुदाई? बाप रे बाप, आज की बात तो कुछ और ही थी। अकस्मात लिंग के एक ही करारे वार को झेलना मानो कम था, उसके बाद के कहर बरपाते मशीनी अंदाज में भकाभक प्रहारों ने तो मुझे हलकान ही कर दिया। पागल कुत्ते की तरह लगा भंभोड़ने मुझे। लगा झिंझोड़ने मुझे। मेरी चूचियों को बेरहमी से निचोड़ते हुए कुत्ते की तरह तूफानी रफ्तार से लगा चोदने।

“मादरचोद बोलतीहै रंडी मां? हां मादरचोद हूं। हरामजादा बोलती है मां की चूत? हां हूं मैं हरामी, पता नहीं किस बाप की औलाद हूं। कुत्ता बोलती है साली कुतिया मॉम? हां मैं कुत्ता हूं, तुझ कुतिया मां की औलाद। अब ले, ओह ले, आह ले, मुझ कुत्ते का लंड ले, ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्।” बोलते हुए और क्रूर हो उठा। दे दनादन दे दनादन, नोचते खसोटते चोदता रहा, चोदता रहा, अंतहीन चुदाई में लीन। उसकी पाशविकता से मैं दहशतजदा थी, भयाक्रांत थी, लेकिन साथ ही साथ एक अलग ही रोमांच से भर उठी थी। एक अलग अनुभव, मानो किसी पागल बनमानुष से चुदी जा रही थी।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्मां्आ्आ्आ्आ।” पीड़ा और आनंद के मिश्रित उद्गार निकल रहे थे मेरे मुह से। यह अंतहीन चुदाई करीब पैंतालीस मिनट तक चलता रहा। इस दौरान चाहे अनचाहे मैं तीन बार झड़ी, ओह मां, और क्या खूब झड़ी। पसीने से सराबोर हो गयी थी। जब वह खल्लास हुआ, कहर ही ढा दिया था मुझ पर। मेरी मलीदा बन चुकी चूचियों को ऐसे निचोड़ते हुए खल्लास हुआ मानो चूचियों का सारा रस बाहर निकाल देगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” न चाहते हुए भी मेरी लंबी चीख निकल गयी।

“चीख मां की लौड़ी, चिल्ला हरामजादी बुरचोदी कुतिया मां्मां्आ्आ्आ्आ।” गुर्राता हुआ झड़ कर निढाल हो गया। मैं उसके बनमानुषी शरीर के नीचे दबी, कुचली, बेजान पड़ी रही। मगर यह कुछ ही मिनटों की राहत थी मेरे लिए। करीब दस मिनट बाद पुनः उसके निढाल शरीर में जान आने लगा। वह एक तरफ पलट जरूर गया था लेकिन मेरे थक कर चूर शरीर को अपनी बांहों की कैद से मुक्त नहीं होने दिया था। पुनः चूमने लगा मुझे।

“वाह रानी, जितना चोदो मन ही नहीं भरता।”

“चाहे इसमें मेरी जान ही चली जाय।” खीझ रही थी मैं।।

“जान जाए तेरे दुश्मनों की। तू मर नहीं सकती, हर हाल में मजा ले सकती हो और मजा दे सकती हो।” हवस की अबूझ प्यास अब भी उसकी आंखों में तैर रही थी।

“हट जंगली जानवर, ऐसा भी कोई नोचता है अपनी मां को?”

“नोचता है, कुत्ता किसी भी मादा कुतिया, चाहे उसकी मां ही क्यों न हो, नोचता है, सभी जानवर अपनी मां को भी इसी तरह नोचते खसोटते चोदते हैं, मैं कहां अपवाद हूं।”

“वाह हरामी, बहुत सीख गया है। सीख कर मुझी को सिखा रहा है कमीना।” कलपती हुई बोली।

“सिखाया किसने?” शरारत से बोला।

“ठीक है, ठीक है, अब छोड़ मुझे, हो गयी न तेरी इच्छा पूरी।”

“अभी कहां? अभी तो बाकी है, तेरी गुदा का गूदा निकालना बाकी है मेरी रांड मॉम। सबसे खूबसूरत तो तेरी गांड़ ही है। बिना चोदे कैसे छोड़ दूं?”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, बहुत हो गया।” कांप उठी उसकी अदम्य कामुकता को देख कर।

“हां्हां्आं्आं्आं, हां्हां्आं्आं्आं। चोदुंगा चोदुंगा, तेरी गांड़ चोदुंगा।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”

“चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प् छिना्आ्आ्आ्आ्आल, दे दे गांड़।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”

“बोला न दे दे गांड़ चोदने।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”

“साली तू ऐसे नहीं मानेगी।” बिल्कुल भूल गया था वह कि मैं उसकी मां हूं। अब तो मां भी नहीं बोल रहा था, सिर्फ, एक औरत, चुदने के लिए चूचियां और चूत लिए पैदा एक लंडखोर औरत। खीझ कर मुझे बेदर्दी से पलट दिया और दुबारा कुतिया बनने के लिए मजबूर कर दिया। मेरे पास और चारा भी क्या था, उसकी हर कुत्सित कामेच्छा को पूर्ण करने को मजबूर एक बेबस औरत बन चुकी थी।

“ओह्ह्ह्ह् बेदर्दी।”

“जो बोलना है बोल रंडी। गांड़ तो चोद कर रहूंगा।” अपने लंड के सुपाड़े को ज्यों ही मेरी गुदा द्वार से सटाया, आने वाली हौलनाक मुसीबत की आशंका से मेरा दिल बैठा जा रहा था। दम साध कर मन को कड़ा करने का प्रयास कर ही रही थी कि भच्चाक, आव देखा न ताव, बेताबी से पेल ही तो दिया अपना खंजर मेरी गुदा में। “ये ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए्ए मेरा्आ्आ्आ्आ्आ पपलू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ अपनी गांआंआंआंआंआंड़ में हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।”

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” पीड़ा, “उफ्फ्फ्फ्फ्फ,” अकथनीय पीड़ा, चीख निकालने को वाध्य हो गयी। सूखा सूखा जो ठूंस दिया था अपना लिंग उस कमीने नें। जहां मेरी दर्दनाक चीख निकली वहीं क्षितिज की खुशी भरी किलकारी गूंज उठी।

“हा हा हा हा, ओह ओह मेरी मां, मस्त मस्त गांड़, ओह्ह्ह्ह् मेरी मदमस्त गांड़ की मालकिन मॉम, स्वर्ग है स्वर्ग है तेरी गांड़ में। घुस गया घुस गया, चीखो मत मां, अब आएगा मजा गांड़ चुदाई का।”

“ओह्ह्ह्ह् राक्षस, मरी जा रही हूं मैं।”

“न न न, ऐसी अशुभ बात नहीं बोलते लंडखोर। देख मुझे कितना मजा आ रहा है, तेरी गांड़ मेरा लौड़ा चूस रही है, वाह।”

“तेरा लंड मेरा्आ्आ्आ्आ्आ गांड़ फाड़ रहा है मादरचोद।” अबतक पीड़ा से बेहाल थी।

“हट हरामजादी, फाड़ रहा है, ड्रामा कर रही है गांड़ की गुनिया। न जाने कितने लंड खा चुकी है इसी गांड़ में साली गांड़ चोदी।” दरिंदगी की पराकाष्ठा थी यह मेरे लिए। मेरी कमर को वहशी जानवर ने इतनी सख्ती से जकड़ा था कि मानो उसके पंजे मेरी चमड़ी के अंदर धंसे जा रहे हों। उसी पाशविक पकड़ के साथ उसने जो एक बार मेरी गांड़ की कुटाई शुरू की तो एकबारगी मैं दहल उठी।

“धीरे, धीरे रे कसाई। ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्।” मै सचमुच परेशानी में थी। लेकिन वह तो जंगली जानवर बन चुका था। एक बार शुरू हुआ तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। रोबोट की तरह गचागच ठोके जा रहा था, कूटे जा रहा था मेरी गुदा का गूदा निकालने पर अमादा था वह।

“न न न न, अब कहां धीरे। ऐसे में बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह रहा है। ले ले ले ले ले मेरा्आ्आ्आ्आ्आ लौड़ा खा अपनी गांड़ मे। ओह ओह आह आह आह। तू भी मजा ले।”

“मजा? आह्ह्ह्ह्ह् साले मजा? दर्द दे कर मजा?”

“अब चुप रह।” ओह अब कुछ ही मिनटों पश्चात मैं भी संभोग का लुत्फ उठाने में सक्षम हो गयी। दर्द काफूर हो गया। मीठा मीठा दर्द जरूर था, शायद मेरी गांड़ का अंदरूनी हिस्सा छिल गया था, इतने मोटे और लंबे सूखे सूखे लिंग को ग्रहण करने के प्रयास में। खैर जो भी हो, थोड़ी जलन के साथ लंड के घर्षण का अद्भुत आनंद आ रहा था।

“आह्ह्ह्ह्ह्, ओह्ह्ह्ह्, चोद मां के चोदू बेटे चोद, मेरी गांड़ का भुर्ता बना आह्ह्ह्ह्ह् मां के लौड़े।” अब आ रहा था मजा। ओह्ह्ह्ह्, पीड़ा के पश्चात स्वर्गीय सुख की अनुभूति। उत्तेजना के आवेश में मैं भी अपनी गांड़ उछालने लगी।

“देख, देख मेरी गांड़मरानी मां को भी आया जोश। वाह वाह, ये हुई चुदासी मां की असलीयत। हां हां हां, ऐसे ही चुदती रह मेरी कुतिया मां।” खुशी के मारे चहक उठा वह। और जोश खरोश के साथ मेरी गांड़ का तिया पांचा करने में लीन हो गया। बीच बीच में मेरी चूत में उंगली भी करता जा रहा था। आनंद देना सीख गया था मेरा चोदू बेटा। मैं अब निहाल थी, सुख के सागर में डुबी चुदी जा रही थी। यह चुदाई कुछ अधिक ही लंबा चला। कभी उल्टा करके, कभी सीधा करके, कभी गोद में उठा कर, चोदे जा रहा था मुझे। यह चुदाई विशेष कर मेरी गुदा पर ही केंद्रित थी, किंतु रह रह कर तीन बार झड़ चुकी थी इस दौरान। समय का हमें पता ही नहीं चला। मेरी गांड़ का फालूदा बनाने के बाद फचफचा कर अपने वीर्य से सराबोर कर दिया। उफ्फ्फ्फ्फ्फ वह रात, रात भर में मेरे जिस्म को निचोड़ कर रख दिया क्षितिज ने। सवेरे तक इसी तरह कामक्रीड़ा का दौर रुक रुक कर पांच बार चला। वह तो पता नहीं कहां से इतनी शक्ति पाया था, छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था मुझे। हर संभव तरीके से मेरे जिस्म का उपभोग करता रहा, करता रहा, अंततः मेरा शरीर अर्धबेहोशी की अवस्था में पहुंच गया। ऐसा लग रहा था कि तीन चार चुदाई के बाद मेरे निर्जीव शरीर को चोद कर अपनी कसर निकालने पर आमादा हो। थक कर चूर, नुची चुदी, निचुड़ी, मसली, बेजान सी, हिलने डुलने से भी लाचार वाली अवस्था थी मेरी। क्षितिज, उसकी चुदाई तो अंतहीन चलती ही चली सुबह तक। सांढ़ था सांढ़, पूरा चुदक्कड़ मशीन।

खैर, सवेरा हुआ, चुदाई बंद हुई, मेरी जान में जान आई। वह तो मुझे नोच खसोट कर, चोद चाद कर मदमस्त चाल में चल दिया। जाने के पहले मुझे चूम कर बोला, “आह्ह्ह्ह्ह् मॉम, यू आर रीयली ग्रेट। जाने का मन नहीं कर रहा है।”

“जाओगे क्यों नहीं?”

“हां जाना तो है ही।” मायूसी से बोला।

“हां, दैट्स लाईक अ गुड बॉय।”

फिर वह चला अपने कमरे में जाने की तैयारी करने के लिए। इधर मैं किसी प्रकार उठी, लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम तक गयी और शॉवर चला कर उसके नीचे पसर गयी। पांच मिनट तक शॉवर के नीचे उसी तरह बेजान सी पसरी रही। फिर किसी प्रकार सारी शक्ति जोड़कर उठी और क्षितिज के जाने की तैयारी में व्यस्त हो गयी। नाश्ते के बाद वह जाने के पहले मुझे अपनी बांहों में कस कर जकड़ लिया और एक प्रगाढ़ चुम्बन मेरे होंठों पर अंकित कर दिया, हरिया और करीम के सम्मुख ही। बेशरम कहीं का। जितने दिन था, तूफान मचाता रहा और कल रात तो मानो पागल ही हो गया था। बिल्कुल निचोड़ कर रख दिया था मुझे।

इसके बाद फिर उसे किसी सहायता या निर्देश की आवश्यकता नहीं रही। पढ़ाई पूरी करने के पश्चात एक बड़ी गैर सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान में सहायक अभियंता के पद पर पदस्थापित होने के दो साल बाद ही तरक्की पा कर वरीय अभियंता के पद पर आसीन हो गया। कई लड़कियां और औरतें उसकी जिंदगी में आई और गयीं, लेकिन शादी व्याह के लफड़े से दूर ही रहना पसंद था उसे, इसलिए आजतक वह आजाद पंछी बना रहा। अब भी जब जी चाहता, मेरी देह में डुबकी लगा लेता था, जो कि अबतक बदस्तूर जारी है।

आगे की घटनाओं को मैं अगली कड़ियों में प्रस्तुत करती जाऊंगी। तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए। अपने विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराते रहिएगा।

आप लोगों की कामुक लेखिका

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।