कामिनी की कामुक गाथा (भाग 69)

पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि किस तरह हमारे एक नये क्लाईंट चेन्नई स्थित अन्ना एंटरप्राईजेस के प्रतिनिधि शिवालिंगम नायर साहब से, उनके नये प्रोजेक्ट के संबंध में मेरी मुलाकात अपने ऑफिस में हुई। उसनें मेरी सुंदरता पर मुग्ध होकर मुझे डिनर पर आमंत्रित किया। उसने बेझिझक अपनी नीयत मुझ पर जाहिर कर दी। डिनर तो बहाना था। नियत समय और नियत स्थान पर पहुंच कर उनके साथ लोकल डीलर हवा पहलवान, कुरूप, लिजलिजे, भेड़िए सरीखे चौबे जी को देखकर असहज हो उठी लेकिन उनके साथ शराब के नशे की रौ में सब कुछ कर बैठी। नायर साहब ओर चौबे जी नें मिलकर होटल के कमरे में मेरी नग्न देह के साथ अपने अपने मन मुताबिक ढंग से अपनी कामपिपाशा शांत की। रात भर शराब पी पी कर, बारी बारी से, सुस्ता सुस्ता के, जी भर के किसी बाजारू रंडी की तरह मेरी देह का उपभोग किया और मुझे पूरी तरह निचोड़ कर करीब करीब अधमरी ही कर दिया। खैर मुझमें ऐसी परिस्थितियों को झेलने का सामर्थ्य तो था ही, ऐसी परिस्थितियों की आदी थी, कामुकता की मारी बेगैरत, बेशर्म छिनाल हो चुकी थी मैं। खुश थी कि नायर साहब को खुश करके उनकी कंपनी के एक्सटेंशन प्रोजेक्ट का कार्य हथियाने में सफल जो हो गयी थी। अब तक न जाने कितने घटिया, गलीज पुरुषों की, एकल अथवा सामुहिक, घृणित से घृणित कामकेलि में शरीक हो चुकी थी, फिर यह तो उसी कामुक यात्रा की एक कड़ी मात्र थी। वैसे भी नित नये पुरुषों की अंकशायिनी बनने का रोमांच अलग ही था मेरे लिए। विभिन्न रूप रंग, विभिन्न आकार प्रकार और विभिन्न रुचि वाले हवस के पुजारियों के दरिंदगी भरे पैशाचिक संभोग में भी मुझे नया रोमांच और नया आनंद मिलता था। आखिर सेक्स के भूखे, कमीने, बेशरम बुजुर्गों और कामुकता के समुंदर में आकंठ डूबे अपने अभिभावकों से सुसज्जित परिवार की, कामाग्नि में धधकती बेहया पुत्री जो ठहरी। इसी तरह मेरी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही थी।।

अब आगे: –

पिछली कड़ी में मैंने बताया था कि मंदबुद्धि रामलाल की जिद के कारण हम उसे अपने यहां रखने में मजबूर थे। दूसरे दिन भी उसने जाने से मना कर दिया। उसके घरवाले भी उसे वापस न ले जा सके। उसे वापस ले जाने की ज्यादा बेकरारी तो मुझे लगता था कि सरोज के अंदर थी। रामलाल के वापस न जाने का कारण शायद मुझे देख कर ही वह समझ गयी थी। उस औरत की मायूसी मुझसे देखी नहीं गयी।

जब वह निराश लौट रही थी तो मैं ने उसे टोक दिया, “सरोज बहन।”

“जी बोलिए।” वह थमक गयी।

“आप इतनी मायूस क्यों हैं? रामलाल जी यहां सही सलामत हैं, खुश हैं।”

“मगर अपना घर रहते हुए… यहां रहना…”

“तो क्या हुआ, इसे भी अपना ही घर समझ रहे हैं ये तो।”

“वहां अपने लोगों के बीच रहना अधिक अच्छा होता ना।”

“हमें भी ये अपना ही समझते हैं।” मैं अब मुस्कुरा रही थी। “वैसे एक बात बोलूं?” वह अब तनिक आशंकित हो प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगी। यह वार्तालाप सिर्फ हम दोनों के मध्य हो रहा था। आसपास कोई नहीं था।

“आप बीच बीच में आ सकती हैं हमारे यहां इनसे मिलने।” मैं बोली।

“लेकिन…..”

“लेकिन क्या?” अब वह दायें बायें देखने लगी।

“आप मत बोलिए, मगर मैं समझ रही हूं।”

“क्या समझ रही हैं?” तनिक लाल हो रही थी।

“मैं सब जानती हूं। बताऊं?” मुस्कुराते हुए बोली मैं।

“त त त त तो क क क क्या इन्होंने सब बता दिया?” हकलाते हुए बोली वह।

“हां, सब कुछ, इनके और तुम्हारे, रबिया और शहला के बीच वाला संबंध, सब कुछ।”

“हे रा्आ्आ्आ्आम।” शर्मसार हो उठी वह।

“इसीलिए मैं कह रही हूं, आ जाना, जब मन करे। रबिया, शहला या कोई भी।” बड़ी उदार बन रही थी मैं, बड़ी कमीनी मुस्कान के साथ बोली।

“तो ककक्या इन्होंने…..?”

“हां हां, इन्होंने मुझे भी नहीं छोड़ा।” अब मैं खुल कर बोली।

“हे भगवान!”

“क्या हे भगवान? अच्छे मर्द हैं। अच्छा खासा हथियार है। अच्छी तरह करते हैं। अच्छा लगा मुझे।”

“मगर इनका तो… बहुत बड़ा है!” वह आश्चर्य से मुझे ऊपर से नीचे देखती हुई बोली।

“तो? तो क्या? एक औरत को और क्या चाहिए? ऐसा ही दमदार हथियार वाला मर्द ही तो।” मैं अब आ गयी अपनी औकात पर। “तो अब? क्या इरादा है? यहीं आ जाया करो।” मैं उससे बोली। वह अब निरुत्तर थी। लेकिन अब उसके चेहरे से वह लज्जा तथा अपराधबोध तिरोहित हो गया था। खुल गयी थी मुझ से।

“मैं तो आ जाऊंगी, लेकिन बाकी?”

“बाकी कौन? रबिया, शहला? सबको बोल दीजिये, दरवाजा खुला है मेरा, सबके लिए।” मैं कमीनी कम थोड़ी थी।मुझे पता था, यह आएगी, रबिया, शहला या और जो भी, सब आएंगी, रामलाल के लंड के आकर्षण में बंधे और रामलाल ही क्यों, यहां चोदुओं की कमी है क्या, निकल पड़ेगी हरिया और करीम की भी, साले कमीने, सब के सब एक नंबर के चुदक्कड़। आश्वस्त सरोज लौट गयी। फिर क्या था, वही हुआ, जैसा मैंने सोचा था। आने लगी सब हमारे यहां, जब तब, चुदने। हरिया और करीम भी बहती गंगा में हाथ धोने में कहां पीछे रहते, साले बूढ़े औरतखोर, शहला को तो इस उम्र में ही रंडी बना डाला था कमीनों नें। हां मैं शहला से हमेशा से कहती रही कि अपनी पढ़ाई में कोई कोताही न बरते। तन की भूख मिटाना एक बात है और अपने कैरियर को संवारना एक बात है। शहला समझदार थी, समझ गयी।

जैसा कि मैंने निश्चय किया था, रामलाल जैसे लोग, परिवार से परित्यक्त बुजुर्ग, असहाय लोगों के लिए एक आश्रय की व्यवस्था करूंगी। हमारे यहाँ धन और स्थान की कमी तो थी नहीं, अत: जुट गयी इस योजना को अमलीजामा पहनाने हेतु। इस कार्य हेतु मैंने कई संबंधित लोगों से संपर्क साधा और एक आश्रम की रूपरेखा तैयार की। आश्रम के लिए आवश्यक कागजी कार्यवाही पूरी की, अनुमोदन हासिल किया और एक भवन निर्माण अभियंता श्री हर्षवर्धन दास से नक्शा बनवा कर उन्हीं को भवन निर्माण के कार्य का जिम्मा दिया। इस भवन का प्लान दुमंजिला, करीब पांच हजार आठ सौ वर्गफीट, अर्थात करीब साढ़े तेरह डिसमिल क्षेत्र का था। आनन फानन कार्य आरंभ भी हो गया। सर्वप्रथम एक स्टोर रूम का निर्माण हुआ, जिसमें निर्माण सामग्रियां रखी जाने लगीं। काफी बड़ा गोदाम था वह। एक तरफ सीमेंट की बोरियां और एक तरफ भवन निर्माण से संबंधित औजार सामग्रियां रखी जाती थीं। बीच में खाली स्थान पर खाली बोरे बिछे रहते थे, जिसपर मजदूर भोजनावकाश के समय थोड़ा सुस्ता लिया करते थे।

इधर भवन निर्माण कार्य आरंभ होने के करीब दो महीने बाद की बात है। एक दिन यूं ही संध्या बेला में, जब सभी मजदूर कार्य से निवृत होकर निर्माण स्थल से रुखसत हो चुके थे, ऑफिस से लौटकर भवन निर्माण की प्रगति के निरीक्षण हेतु मैं उस स्थान का मुआयना कर रही थी, तभी स्टोर रूम के बंद द्वार के अंदर से कुछ सुगबुगाहट सुनाई दी। मुझे कुछ आशंका हुई। उत्कंठा के कारण मैं दरवाजे के समीप गयी तो अंदर से पुरुष स्वर सुनाई पड़ा। इस समय कौन हो सकता है? सब तो चले गये हैं। गोदाम के दरवाजे पर ताला हम नहीं लगाते थे, क्योंकि गोदाम हमारे चहारदीवारी के अंदर थी। दरवाजे को हल्के से ठेलने पर वह खुद ब खुद खुल गया। शाम हो चुकी थी किंतु अंधेरा अभी इतना घना भी नहीं हुआ था कि अंदर की चीजें न दिखें। वहां जो कुछ मुझे नजर आया, विस्मित करने वाला था। बिछे हुए बोरे पर एक व्यक्ति नग्नावस्था में औंधे मुंह लेटा हुआ था और उसके ऊपर दूसरा व्यक्ति, वह भी नग्नावस्था में सवार, नीचे वाले व्यक्ति की कमर पकड़ कर धकमपेल में व्यस्त था। बताने की आवश्यकता नहीं कि वहां क्या हो रहा था। दोनों के मुंह से मस्ती भरी आहें निकल रही थीं।

“यह क्या हो रहा है यहां?” मैं बोल उठी। मेरी आवाज सुनकर दोनों हड़बड़ा गये। जल्दी से उठ कर ज्योंही उन्होंने मुझे देखा तो शर्म से पानी पानी हो उठे। दोनों ही यहां भवन निर्माण का कार्य करने वाले थे। नीचे वाला करीब सत्रह अठारह वर्ष का काला कलूटा चिकना, पांच फुटा, आदिवासी लड़का था और ऊपर वाला व्यक्ति करीब पैंतालीस वर्ष का, लंबा चौड़ा, करीब छ: फुट से कुछ ऊपर कद का, हट्ठा कट्ठा दाढ़ीवाले अधेड़ राजमिस्त्री, मुसलमान, सलीम मियां थे। मगर मेरी नजर तो उस राजमिस्त्री के भीमकाय लिंग पर ठहर गयी। बाप रे बाप, करीब नौ इंच लंबा और वैसा ही भयानक मोटा, काले नाग की तरह फनफना रहा था। उफ्फ्फ, एकाएक किसी स्त्री की नजर पड़ जाए तो आंखें फटी की फटी रह जाएं, मगर मैं तो ठहरी एक नंबर की लंडखोर, मेरे मुंह में तो पानी ही आ गया। मुंह में ही क्यों, मेरी योनि भी गीली होने लगी थी। इतने बड़े लिंग से वह चिकना लड़का इतनी मस्ती के साथ कैसे गुदा मैथुन में लिप्त हो सकता है भला? अवश्य गुदा मैथुन का आदी था।

मेरे अकस्मात आगमन से घबराए मिस्त्री की तो घिग्घी बंध गयी, फिर संभल कर बोलने की कोशिश करने लगा, “मैडम, वह वह वह…..” आगे कुछ बोल नहीं पाया।

“वह वह क्या? लौंडेबाज मिस्त्री मियां, यहां काम करने आते हैं कि यही सब करने?” मैं हड़काने लगी।

“मैडम जी, माफ कर दीजिए।” घिघियाते हुए बोला वह।

“क्यों?”

“ठीकादार को पता चलेगा तो हमको निकाल देगा।” ऐसा मैंने दिखाया मानो मुझे दया आ गयी, वास्तव में तो उसके आकर्षक लिंग नें मुझे मोह लिया था। बड़ा ही मनमोहक आकर था उसके लिंग का। विशाल सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा कटा हुआ, अर्थात खतना किया हुआ लिंग। मन को मोह लेनेवाले गुलाबी रंगत लिए हुए चमचमाते, टेनिस बॉल सरीखे सुपाड़े की छटा देखते ही बन रही थी।

“लेकिन यह तो गलत है। आपलोग काम करने आते हैं कि यही सब करने? मैं बताऊंगी आप लोगों के ठेकेदार को।” झूठमूठ का धमका रही थी।

“ऐसा मत कीजिए मैडम। माफ कर दीजिए।” वह अपने कपड़े की ओर झपटा।

“नहीं, कोई माफी नहीं।” मैं बोली, कभी मैं उसके चेहरे को देखती, कभी उसके फनफनाए लिंग को। मुझे लगता है उसने मेरी नजर को पढ़ लिया था और मेरे चेहरे के भाव को भी। रुक गया, असमंजस में।

“आप की माफी के लिए हम और क्या करें? जो बोलेंगी करेंगे, मगर बताईगा मत ठीकादार को।” वह अपने कपड़े छोड़कर खड़ा हो गया, अब भय उसके चेहरे से गायब हो रहा था।

“क्या कीजिएगा आप बताईए तो, ताकि मैं आपके ठेकेदार को न बताऊँ?”

“आप बोलिए तो।” ताड़ गया था शायद मेरा इरादा।

“नहीं, पहले बताईए करना क्या है आपको?” मैं जानबूझकर इशारे में ही आमंत्रण दे रही थी।

“करके बताएं?” अब शायद वह समझ चुका था कि मैं क्या चाह रही हूं।

“हां।” यह मेरी सहमति थी। वह आदिवासी लड़का वैसे ही नंगा भुजंगा, चुपचाप खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। मेरे अकस्मात आगमन से ज्यों ही वे दोनों अलग हुए और खड़े हुए तो उस आदिवासी लड़के का लिंग भी सख्त था, करी छ: इंच लंबा था उस वक्त, किंतु भय से इस वक्त सिकुड़ कर लुल्ली बन गया था।

“सचमें करें?” अंतिम सहमति चाह रहा था वह।।

“कर के दिखाईए?” उन्हें और क्या चाहिए था। झपट पड़ा मुझ पर। मैं सलवार कमीज में थी लेकिन जैसे ही वह मुझ पर झपट्टा मारा और अपनी मजबूत बांहों में कसा, ऐसा लगा मानो मेरी सलवार फाड़ डालने पर आमादा हो उसका तना हुआ मूसल। मैं गनगना उठी भीतर ही भीतर।

“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, यह यह क्या कर रहे हैं?” मैं नौटंकीबाज हड़बड़ा कर बोली।

“वही, जो आपने कहा।”

“मैंने क्या कहा?” उसकी बांहों में छटपटाने का नाटक करती बोली।

“कर के दिखाने को।”

“यह करने तो नहीं।”

“बोलिए मत। हमको पता है क्या करने को कहा है आपने?” सेक्स के भूखे पुरुष का वही चिर परिचित अंदाज।

“उफ्फ भगवान, छोड़िए।”

“छोड़ कैसे दें बिना किए?” अब वह दढ़ियल मुझे चूमने लगा। खैनी पान खा खा कर बदबूदार मुंह। बदबू के बावजूद पिघल रही थी उसकी बांहों में।

“हाय हाय, छोड़िए, मैं ने ऐसा तो नहीं कहा था।” मैं बेवजह विरोध का दिखावा करने लगी।

“आपने क्या कहा, अब इसका कोई मतलब है क्या? हमको तो करना है बस।” वह इस मौके को गंवाने के मूड में नहीं था। वह भी शायद समझ रहा था कि मैं अगर सचमुच का विरोध करती तो अबतक चीख पड़ी होती। वह अब न सिर्फ मुझे चूम रहा था, बल्कि मेरे सलवार के नाड़े पर हाथ डाल चुका था।

“हाय राम, यह यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैंं? छोड़िए।”

“छोड़ने के लिए थोड़ी न पकड़ा है?” खोल चुका था मेरी सलवार। सलवार नीचे गिर गयी। अब मैं नीचे सिर्फ पैंटी में थी जो गीली हो चुकी थी। अब उसने मेरी कमीज पर हाथ डाला।

“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह भगवान, यह यह मेरी सलवार, आह्ह। ओह मेरी कमीज छोड़िए, ओह।” कहां रुकने वाला था वह कामांध कमीना। उतार ही डाला खींच खांच कर मेरी कमीज। इस खींच तान में पट गिर पड़ी मैं झपाक से, वहां पड़े सीमेंट के बोरों के ऊपर, गिरी भी कैसे, मुंह के बल, आधी खाली सीमेंट बोरी के ऊपर। चेहरा मेरा सीमेंट से सन गया। बंदरी बन गयी थी मैं। अब मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी।

“अबे गांंडू मादरचोद, देख क्या रहा है खड़े खड़े। लाईट जला, जरा देखें तो मैडम का बदन, चेहरा तो देख लिए हैं, बंदरिया बन गयी साली।” उसकी आवाज में अब दहशतनाक गुर्राहट निकली, जंगली भेड़िए सी गुर्राहट। उत्तेजना के मारे पगला रहा था वह। वही हाल मेरा भी था लेकिन मैं जाहिर नहीं कर रही थी। बल्ब की रोशनी में नहा उठी मैं। मेरी भीगी पैंटी देख, सलीम मियां को समझते देर न लगी कि मैं अबतक बेमतलब का नाटक कर रही थी। “वाह मैडम, कमाल का जिस्म है आपका तो। अब ब्रा और चड्डी भी हम ही खोल दें कि आप खुद खोलिएगा।” जहां मैं गिरी थी वहां सीमेंट का एक खुला हुआ आधा बोरा पड़ा था। मेरे गिरते ही सीमेंट का गुब्बार सा उठा और मैं सीमेंट से नहा उठी।

“उफ्फफ ओह्ह्ह्ह्ह।” मैं ने इस हालत की कल्पना नहीं की थी। जबतक मैं संभलती, मिस्त्री सलीम मियां मेरी सीमेंट सने तन पर झपट पड़ा और पैंटी ब्रा से मुझे मुक्त कर दिया। अब मैं नंगी थी। पूर्णतया नंगी। पूरा शरीर तो सीमेंट सीमेंट हो चुका था लेकिन ब्रा और पैंटी के कारण सीमेंट पुतने से बची मेरी बड़ी बड़ी चूचियां और फकफकाती योनि चमचमा रही थीं। मेरी नग्न देह का यह आलम देख कर मिस्त्री की उत्तेजना का पारावार न रहा।

“मैडम जी, अब क्या कहती हैं? आप तो मना कर रही हैं और आपका भोंसड़ा चोदवाने के लिए आंसू बहा रहा है।” वही जानी पहचानी हवस भरी मुस्कान खेल रही थी उसके होंठों पर।

“नहीं तो बोल रही हूं ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं।”

“केवल मुंह से।” अब उससे और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मेरी फुदकती योनि उसे आमंत्रित कर रही थी। छा गया मेरे सीमेंट से सनी नग्न देह पर और एक हाथ से मुझे दबोच दूसरे हाथ से अपने भीमकाय लिंग के विशाल सुपाड़े को मेरे योनिद्वार पर टिका कर बिना आगा पीछा सोचे कचकचा के घुसेड़ दिया अंदर।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्,” एक दर्द की लहर सी दौड़ गयी मेरे तन में। था भी तो इतना मोटा लिंग। मेरी योनि को चीरता सर्र से प्रविष्ट हुआ था। उसके करारे धक्के से मेरे नितंब के नीचे से सीमेंट का गुबार उठ गया। मेरे शरीर पर सीमेंट का पाऊडर पुत गया था। अपनी इस हालत के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार थी, तनिक कोफ्त तो हुई लेकिन मेरे सीमेंट पुते शरीर के साथ सलीम मियां जो कुछ कर रहा था वह भी कम रोमांचक नहीं था। कुछ पलों की उस पीड़ा को मैं पी गयी क्योंकि मुझे पता था कि इसके बाद के आनंद में मैं खुद ही डूब उतरा रही होऊंगी।

“अब काहे का आह ऊह। ससेट दिया मेरा लौड़ा।इतने बड़े भोंसड़े में इतना मोटा लौड़ा इतनी आसानी से खा लेने के बाद ई आह ऊह का ड्रामा काहे का? लंडखोर कहीं की, कोई और होती तो चिल्लाने लग जाती, लेकिन तू तो बहुत बड़ी रंडी है रे मां की बुर, खा ली एक्के बार में पूरा लौड़ा, वाह। अब तो चुदवाती जा बुरचोदी।” पहले धक्के में ही उसे पता चल गया था कि मैं कितनी बड़ी रंडी हूं।

“न न न नहीं नहींईंईंईंईंईंईंई, आह्ह, मैं ऐसी नहींईंईंईंईंईंईंई हूं।” मैं अब भी बाज नहीं आ रही थी नौटंकी करने में।

“चू्ऊ्ऊ््ऊ्ऊ्ऊ्प्प्प्प् साली भोंसड़ी की। देख लिया तेरा ड्रामा साली मां का भोंसड़ा।” अब वह मुझ पर बिंदास कहर ढाने लगा। सीमेंट से पुते मेरी चूचियों को दबोच दबोच कर गूंथ रहा था, साथ ही सटासट मेरी चूत का भुर्ता बनाने में जुट गया। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, ओह अब मैं मस्ती में भर कर आहें भरने को मजबूर हो गयी।

“ओह्ह्ह्ह्ह रज्जा, ओह साले मादरचोद दढ़ियल, उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, चोद हरामी चोद कमीने आह ओह आह।” अब मैं भी सीमेंट के बोरे पर अपनी चूतड़ पटक पटक कर उसके विशाल लंड को घपाघप खाये जा रही थी। इधर उधर लुढ़कते चुदाई के आनंद में इतने खो गये कि पूरा शरीर सीमेंट सीमेंट हो गया। हम भूतों की तरह गुत्थमगुत्थी में लीन हो गये थे। वह गांडू लौंडा वहीं खड़ा हमारी चुदाई को बुत बना आंखें फाड़े देख रहा था।

“हां हां बुरचोदी। ले, ये ले, और ले आह ओह, ऐसा मस्त बदन आज पहली बार मिला चोदने को। इतनी रेजाओं के पसीने और सीमेंट सने बदन को चोदा, खूब चोदा, मगर मैडम जी, तेरे को चोदने का ओह ओह मजा ही कुछ और है। सीमेंट से नहायी, तू भी कोई रेजा से कम नहीं लग रही हो, लेकिन वाह री चुदक्कड़ औरत, ओह साली कुतिया, आह बुरचोदी, ऐसा बुर पहली बार मिला आह इतना गरम चूत, उफ उफ बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आ रहा है। हुम हुम हुम।” गंदी गंदी बातें बिंदास, बेधड़क, बेखौफ, बोलते हुए मुझे रगड़े जा रहा था, रगेद रगेद कर चोदे जा रहा था। हर धक्के से मेरे तन को सीमेंट से अट चुके खाली बोरों पर इंच इंच घसीटे जा रहा था। मैं बेहद जंगली तरीके से लुटती हुई, नुचती हुई, चुदती हुई, हलकान होने की बजाय खुद भी जंगली कुतिया बनी, रंडी की तरह उस गलीज, गंदे वहशी जानवर के, पसीने की बदबू से नहाये और पसीने से चिपचिपे तन से पिसती, उसके दमदार ठुकाई में सुख के अनंत समुंदर मे डूब उतरा रही थी। ऐसे चोद रहा था वह मानो मैं कोई मालकिन, कोई संभ्रांत महिला नहीं बल्कि उसके अधीन काम करने वाली कोई गंदी रेजा हूं, जिन्हें वह इसी तरह अपनी हवस का शिकार बनाता रहता है। इस तरह गंदे तरीके से चुदने का एक अलग ही रोमांच का अनुभव कर रही थी। बड़ा मजा आ रहा था।

गंदे आदमी से गंदे तरीके से चुदने का अनुभव था मुझे, लेकिन एक मेहनतकश मजदूर के गंदे, कसरती शरीर से अपने शरीर को इस गंदगी भरे स्थान पर गंदे तरीके से नुचवाने का यह बिल्कुल नया अनुभव था। अपनी सारी शराफत का चोला उतार फेंक कर, “चोद, आह चोद मादरचोद, चोद मां के लौड़े, चोद साले रेजाचोद, बना दे मुझे भी रेजा, बना दे ओह ओह मुझे रंडी साले कुत्ते हरामजादे चुदक्कड़,” बोलती हुई बिल्कुल रंडी की तरह बिंदास चुदी जा रही थी। करीब चालीस पचास मिनट तक वह मुझे, निचोड़ता रहा, रगड़ता रहा, घसीट घसीट कर भंभोड़ता रहा और अंतत: हुआ खल्लास, उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह और क्या खल्लास हुआ, ओह फच्च फच्च मेरी चूत में फौव्वारा छोड़ने लगा अपने गंदगी भरे वीर्य का।

“ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” मुझे इतनी जोर से दबोचा कि मेरी सांस ही मानो रुक गयी थी। लेकिन जो भी हो, मैं निहाल हो उठी। बेसाख्ता खुद भी चिपक गयी आनंदमुदित। उस दौरान मैं तीन बार झड़ी, और वाह, क्या खूब झड़ी। कुश्ती के पश्चात जैसे दो पहलवान हांफते हैं, वैसे ही पसीने से लतपत, सीमेंट से पुते, पड़े हांफ रहे थे, पूर्णतयः तृप्त।

“आह रज्जा, बड़ा आनंद दिया रे चोदू, दीवानी बना दिया साले चूतखोर, चुदक्कड़ मियां, जवाब नहीं तेरे लंड का और तेरी चुदाई की।” मेरे उद्गार थे। बेसाख्ता चूम उठी उस हवस के पुजारी को। परवाह नहीं थी अपने शरीर की दुर्दशा की, यादगार जो था वह लंड, यादगार जो थी वह चुदाई, ठीक अपनों की नाक के नीचे, अपने ही परिसर में।

“तेरा भी जवाब नहीं रे लंडखोर रानी। यह तो शुरुआत है। अभी तो हमारे बीच एक से एक चुदक्कड़ बाकी हैं। इस लौंडे से पूछ ले, कैसे हम सबके लंड खाता रहता है अपनी गांड़ में, सब मिलेंगे, सब चोदेंगे, खुश हो जाएंगे सब, ऐसी मालकिन अल्लाह करे सबको मिलें।” वह मुदित मन रहस्योद्घाटन कर रहा था और मैं खुश हो रही थी कि बैठे बिठाए अपने परिसर में ही ऐसे चुदक्कड़ मिल रहे हैं। मिलूंगी, सबसे मिलूंगी, चुदुंगी, सबसे चुदुंगी, यह सोचते हुए अपने नुचे चुदे, थके, गंदे शरीर में सारी शक्ति एकत्रित कर सबकी नजर बचा कर अपने घर में दखिल हुई और सीधे अपने कमरे के बाथरूम में घुस गयी, फ्रेश होने।

आगे की कथा अगली कड़ी में।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।