कामिनी की कामुक गाथा (भाग 72)

पिछली कड़ी में आपलोगों नें पढ़ा कि किस तरह मैं ऑफिस से लौट कर अपनी वासना की आग बुझाने हेतु अपने यहां के कामगरों में से तीन मिस्त्रियों की हवस की शिकार बनी, उसी गोदाम में, जहां एक दिन पहले सलीम मियां नें मेरे तन का रसपान किया था। उस दिन तो एक था, आज तीन। उन तीनों नें उसी गंदे गोदाम में बेहद गंदे तरीके से मेरे तन को नोचा, खसोटा, भोगा और मैं मुदित मन नुचती रही। उनसे नुच चुद कर बेहाल, अपनी सांसों पर अभी नियंत्रण भी नहीं पायी थी कि एक घृणित प्रस्ताव सलीम की ओर से आया और बिना सोचे समझे, अपनी वासना की भूख और रोमांच की चाह में स्वीकार बैठी। सारे कामगरों से मेरे तन को साझा करने के उस घृणित प्रस्ताव को कबूल बैठी। उनके रुखसत होते ही मैं आ गिरी अपने ही घर के अंदर उपस्थित तीन कामुक भेड़ियों की बांहों में। हरिया की बेचारगी भरी मुद्रा और प्रणय निवेदन के आगे नतमस्तक, एक एक करके हरिया, करीम और रामलाल के साथ रासलीला रचाने को वाध्य हुई। पहले तीन मिस्त्रियों की नोच खसोट और तत्पश्चात इन तीन कामांध कामपिपाशुओं की चेष्टाओं में सहभागी होकर अपने तन की अदम्य भूख मिटाते मिटाते निढाल हो गयी।

ऊपरवाले का करिश्मा तो देखिए, दूसरे दिन मेरी पूर्व निर्धारित योजना को सरल बनाने हेतु इन तीनों, हरिया, करीम और रामलाल को घर से बाहर रखने का उपाय भी कर दिया। छुट्टी के दिन उन औरतखोरों नें खुद ही दिनभर सरोज, रबिया और शहला के तन का भोग लगाने का निर्णय ले लिया। खुश हो गयी मैं कि दूसरे दिन जो घृणित खेल यहां होने वाला था, खुद ब खुद निष्कंटक हो गया।

दूसरे दिन का प्रभात एक नया प्रभात था। छ: बजे मेरी नींद खुली। मैं चाहती थी कि ये तीनों जितनी जल्दी यहां से दफा हों उतना अच्छा। कहीं ऐसा न हो कि इनके जाने के पहले ही ‘कामगरों’ के आने का तांता आरंभ हो जाय। ऊपरवाला भी कितना बड़ा अंतर्यामी है, मेरी मनोदशा को समझकर सब योजना तय कर चुका था। यथासमय ये तीनों औरतखोर नाश्ता करके गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गये। अब मैं निर्द्वंद्व, निश्चिंत, स्वच्छंद, स्वतंत्र थी अपनी कमीनी हरकत के लिए। मैंने मैदान साफ देख कर अपनी एक पूर्व परिचित मेकअप आर्टिस्ट को फोन करके फौरन बुला लिया और मेरा मेकअप करने को कहा। जैसा जैसा मैं कहती गयी वैसा ही करती गयी। मेरे चेहरे से लेकर गर्दन से काफी नीचे तक मेरे चमड़े का रंग सांवला हो गया। चेहरा मेरा एक देहातिन की तरह हो गया था। करीब घंटे भर में मैं काफी बदल गयी थी। बाल मेरे तनिक घुंघराले हो गये थे।

उस मेकअप आर्टिस्ट, रेहाना की जिज्ञासा, “क्या बात है कामिनी, आज इस तरह मेकअप का क्या अर्थ है?”

“कुछ नहीं, बस यूं ही मन किया।” मैं बोली।

“मैं जहां तक तुम्हें जानती हूं, तेरा कोई काम यूं ही नहीं होता है। बता ना।” वह तो पीछे ही पड़ गयी थी।

“बताऊंगी बाबा बताऊंगी, लेकिन काम होने के बाद।”

“क्या ऐसा काम है जरा मैं भी तो सुनूं।”

“बोली ना, काम होने के बाद बताऊंगी।”

“तुम जरूर कुछ खुराफात करने वाली हो।”

“हां करने वाली हूं खुराफात। अब हुई तसल्ली?”

“मुझे टाल रही हो तुम।”

“हां टाल रही हूं। अब तुम फूटो जल्दी यहां से।” रेहाना अच्छी मेकअप आर्टिस्ट तो थी ही, मेरी हम उम्र सहेली भी थी। कुछ हद तक हमराज भी थी। नामकुम में ही रहती थी। उसका एक ब्यूटी पार्लर था रांची मेन रोड में।

“कुछ तो गड़बड़ करोगी।”

“हां करूंगी। अब तुम भागो यहां से। कल बताऊंगी सब कुछ। ठीक है?”

“ठीक है ठीक है, अभी तो जाती हूं। कल मिलती हूं, बॉय। वैसे तुम बहुत गंदी महक रही हो।” जाते जाते वह बोली।

“साली तू भागती है कि नहीं। ओके, चल बॉय।” चलो पीछा छूटा। मेकअप समाप्त होते होते करीब आठ बज गये थे। अब मजदूरों के आने का समय हो चला था। जल्दी से रेहाना को रुखसत करके मैं अब तैयार होने लगी। आज मैं फ्रेश नहीं होना चाहती थी। गंदी ही रहना चाहती थी। शरीर पर गंदी महक बरकरार रखना चाहती थी। गंदे कपड़े पहनना चाहती थी। पुराने कपड़ों की ढेर से एक पुरानी सी साड़ी खोज निकाली और पुराना ब्लाऊज, पुराना पेटीकोट, अंत:वस्त्र भी फटे पुराने, मटमैली ब्रा, गंदी फटी पैंटी। सिर्फ ब्रश किया था सवेरे उठकर बस। बिना कंघी किए अपने घुंघराले हो चुके बालों को समेट कर यूं ही कामचलाऊ जूड़े की शक्ल दे दी थी मैंने। तैयार हो कर दर्पण के सम्मुख खड़ी हुई तो एकाएक खुद को ही पहचान नहीं पाई। परिधान और हुलिया किसी रेजा या कामवाली बाई से भी बदतर था। बस हो गयी मैं तैयार, आने वाले मुसीबत या होने वाले रोमांचक मजे के लिए। अब मैं क्या करूंगी, जो करना है वे करेंगे, मैं तो बस सहयोग करूंगी, आखिर सहमति तो दे ही चुकी थी अपनी। पता नहीं कैसे और क्या क्या होना था, यह तो उस समय की परिस्थिति और माहौल पर निर्भर था। जो भी होने वाला था, उसके लिए मानसिक रूप से खुद को तैयार कर चुकी थी। होना भी आखिर क्या था? अंकशायिनी ही तो बनना था मुझे उनकी, लेकिन किस तरह से, पता नहीं। खेली खाई तो थी ही मैं। न जाने किन किन परिस्थितियों से गुजर चुकी थी मैं, उनको निबटा नहीं पाऊंगी क्या? आत्मविश्वास की कमी भी नहीं थी मुझमें। अपनी क्षमता पर भी पूरा भरोसा था। बस यही था कि इस समय मैं कोई योजना नहीं बना रही थी। मेरी समझ से योजना तो ऊपर वाला बना चुका था। इस वक्त मैं ठान चुकी थी कि बिना किसी पूर्व योजना के यथा परिस्थिति अपने साथ जो होना है उसे होने दूं। ऊपरवाला परिस्थितियां पैदा करता जा रहा था, योजना बनाता जा रहा था तो मैं भला कौन होती हूं अपने दिमाग को व्यर्थ कष्ट देने वाली। अब जो होगा सो होगा। एक अनजाने रोमांच से रूबरू होने की कामना थी और उसी में नये किस्म के आनंद के प्राप्ति की जुगुप्सा थी। मन ही मन बोली, “ऊपरवाले, तू देख रहा है ना, अब आगे जैसी तेरी मर्जी।”

भीतर ही भीतर रोमांचित हो रही थी। धमनियों में रक्त का संचार तूफानी गति से हो रहा था। दिल की धड़कनें पल प्रतिपल बढ़ती ही जा रही थीं। मैं घर के सामने वाले बगीचे में फूलों के पौधों की कटाई छंटाई में व्यस्त थी।

“ओय।” तभी मुझे गेट पर से सलीम की आवाज सुनाई पड़ी।

“का है?” मैं गेट की तरफ देखती हुई बोली। मैं आवाज भी थोड़ी बदल कर बोल रही थी। बोलने का लहजा ठेठ देहाती। हुलिया तो खैर बिगड़ा हुआ था ही। एक बार में पहचान पाना थोड़ा मुश्किल था।

“गेट खोल।” सलीम बोला। सलीम के साथ रफीक और बोदरा भी थे। बाकी लोग नजर नहीं आ रहे थे।

“काहे?”

“अरे काम करने आए हैं।” रफीक बोला।

“ओ आप लोग ही यहां काम करने आते हैं?” मैं मजा ले रही थी।

“अरे तू है कौन? जा मालकिन के बुला ला।” बोदरा बोला।

“मालकिन नाही है। ऊ बाहर गयी है।”

“अईसे कईसे? ऊ हमको बुला के अईसे कईसे जा सकती है।” सलीम तनिक मायूस दिखने लगा था अब। वे तीनों अच्छे से, अपने हिसाब से बन ठन कर आए थे।

“अब कईसे जा सकती है ऊ हम का जानें। ठीक है, आपलोग आईए अंदर और मालकिन का इंतजार कीजिए।” मैं गेट खोलते हुए बोली। सलीम मुझे घूर घूर कर देख रहा था।

“तू है कौन?” सलीम से रहा नहीं गया।

“कामवाली, अऊर कौन? चांदनी नाम है मेरा।” मैं गेट बंद कर के कूल्हे मटकाती हुई उनके आगे आगे घर की ओर बढ़ी।

“इससे पहिले तो नहीं देखे तुमको?”

“आज ही तो आए हैं हम गांव से।”

“तू और मैडम में कोई रिश्ता है का?”

“काहे?”

“थोड़ी थोड़ी मैडम जैसी दिखती हो, इसी लिए पूछा।”

“हां, हम उसकी चचेरी बहिन हैं। गांव में रहते हैं। हमको बुलाई है घर का काम वास्ते।”

“ओह, इसी लिए। और बाकी लोग?”

“सब आज घूमने गये हैं। बोले कि सीधे शाम को आएंगे।” मैं बोली।

“ठीक है, ठीक है, मैडम कब आएगी?”

“पता नहीं।”

“तबतक हम का करेंगे रफीक?”

“अब हम का कर सकते हैं? इंतजार करेंगे और का।”

“हमारे बारे में कुच्छो नहीं बोली का?” सलीम मुझसे बोला।

“बोली थी। बोली थी, मिस्त्री, रेजा कुली लोग आएंगे, बैठाना और खातिर करना, ख्याल रखना। काम वाम तो आज करना है नहीं।” मैं आंखें मटकाते हुए बोली।

“का खातिर?” अब उनकी लार टपकाती नजरें मेरे तन पर टिकी थीं।

“यही, चाह पानी अऊर कौनो चीज जो चाहिए, आपलोग बईठिए तो, हम अम्भी आए।” सोफे की ओर दिखा कर बैठने को बोली और मैं कूल्हे मटकाती, लुभावने अंदाज में अपने नितंबों को हिलाती किचन की ओर बढ़ी। पानी ले कर आई और टेबल पर रख दी। अभी मैं वापिस मुड़ी ही थी कि बाहर गेट खड़कने की आवाज आई।

“जा के देख तो, बाकी लोग भी आए हैं का?” सलीम नें रफीक की ओर देखते हुए कहा। रफीक उठ कर गया और उसके साथ साथ मंगरू, मुंडू थे और साथ में छम्मकछल्लो छमिया कांता छमक छमक कर चली आ रही थी। उनके पीछे पीछे तीन और कुली रेजा सोमरी के साथ आ रहे थे।

“रूपा और सुखमनी का क्या हुआ?” सलीम बोल उठा।

“पता नहीं।” मंगरु नें संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“खैर कोई बात नहीं। काम चल जाएगा। ई छम्मकछल्लो, सोमरी अऊर मुंडू तो हईए हैंं। मैडम आ जावेगी तो हो जावेंगे चार। हमलोग हैं सात। हिस्सा बट्टा करके काम चला लेंगे।” सलीम बोला। “हां तो तू का कह रही थी? जो हम चाहें मिलेगा का?” अब उसकी नजरें मेरे तन को ऊपर से नीचे तौल रही थीं। अंदर ही अंदर पुलकित हो उठी, इस अनाकर्षक चेहरे के बावजूद अपने तन के खूबसूरत बनावट पर। पता नहीं कि मेरे तन की खूबसूरती का ही आकर्षण था या मात्र एक सुलभ उपलब्ध भोग्या नारी तन का। इन औरतखोरों की नजरों में स्त्री के सौंदर्य का क्या महत्व है, इसका तो पता नहीं, किंतु स्त्री एक भोग्या है, यह महत्व तो अवश्य पता है उनको। खैर मुझे इससे क्या, इतना तो समझ गयी इनकी नजरों से कि मैं इनकी दृष्टि में आ चुकी हूं, एक शिकार।

“हां, मालकिन तो अईसा ही बोली। जो मांगेंगे दे देना।” मैं बोली।

“जो मांगेंगे वो दोगी तुम हमें?”

“अगर यहाँ है तो काहे न देंगे।” मैं बोली।

“यहाँ है वही मांगेंगे।”

“तो मिलेगा।” मैं बोली।

“ना तो नहीं करोगी?”

“हम भला काहे ना करेंगे। हम ना करेंगे तो दीदी भगा  न देगी हमको?” मैं बोली।

“सोच लो।”

“अब इसमें हमको का सोचना। दीदी सब कुछ सोच के ही ना अईसा बोली होगी?” मैं आंखें नचाती हुई बेधड़क बोली। मैं जानती थी कि उनके कथन का आशय क्या था, फिर भी अनजान बनी, नादान बाला बनी हुई थी। मैं जानती थी कि बात का रुख किधर जा रहा है, फिर भी अनजान बन रही थी।

“अच्छा ई बता, मैडम कब तक आवेगी।” रफीक बोला। अब वे लोग उतावले हो रहे थे।

“पता नहीं, शायद ना भी आवे। कह रही थी कि जरूरी काम से जा रही हूं।” मैं बोली।

वहां उपस्थित सभी लोग दुविधा में डूबे एक दूसरे को देख रहे थे। आंखों ही आंखों में बातें भी कर रहे थे। अंततः सलीम बाकी लोगों से मुखातिब हो कर बोला, “तो अब का इरादा है?”

“इरादा क्या है पता नहीं है का तुमको? हम यहां काहे आये हैं पता नहीं है का तुमको?” रफीक बेसब्र हो रहा था।

“ऊ बात नहीं, बात ई है कि, चांदनी……” सलीम रुक गया।

“ई तो बोल ही रही है, जो मांगेगे मिलेगा, फिर काहेका सोचना। वैसे भी यह अपनी दीदी से कम थोड़ी न है।” अब बोदरा बोला।

“हां तो चांदनी, जो मांगेंगे मिलेगा ना?” सलीम अब तसल्ली कर रहा था।

“कह तो रही हूं, सब कुछ मिलेगा।”

“बाद में मैडम को शिकायत तो नहीं करोगी?”

“काहे की शिकायत? दीदी ही तो बोली है।”

“ठीक है, तो तुम तैय्यार हो?”

“हां बाबा हां।”

“हम सब यहां अभी एक खेल खेलेंगे।”

“तो खेलो ना।”

“तुमको भी हमारे साथ खेलना होगा।” ललचाई नजरों से मुझे देखते सलीम बोला।

“कैसा खेल?” मैं अनजान बनती हुई पूछी।

“सब समझा देंगे। खेलोगी ना?”

“खेल में मजा आएगा तो?” उत्सुकता से पूछी।

“बड़ा मजा आएगा पगली।”

“ठीक है, खेलूंगी।” मैं धड़कते दिल से सहमत हो गयी। जानती थी कि इस खेल का मतलब क्या है, लेकिन जरा देखना था कि ये शुरुआत कैसे करते हैं। मेरी सहमति पा कर सभी की बांछें खिल गयीं। मेरी कमनीय देह का आकर्षण ही ऐसा था।

“बहुत बढ़िया, वैसे भी कामिनी मैडम और चांदनी में कोई खास फर्क भी नहीं है। मजा आएगा।” रफीक प्रसन्नता से बोला।

“तो ठीक है, चलो हम खेल शुरू करते हैं।”

“कौन सा खेल?” मंगरू अब बोला।

“अरे वही, जो हम बीते इतवार कांता के यहां खोकोन और मुंडू के साथ खेले थे।”

“हट हरामी।” कांता तुनक गयी।

“वाह, ताश लाए हो?” कांता की बात को नजरअंदाज करते हुए प्रसन्नता से रफीक बोल उठा।

“हां भाई, ये रहा ताश।” पॉकेट से ताश की गड्डी निकालते हुए बोला सलीम।

“तो चलो शुरू करते हैं।” सलीम बोला।

“पहिले खेल का नियम तो बताओ।” मैं बोली।

“ठीक है। तुम पहली बार खेल रही हो ना। बताते हैं। सुनो। अभी हम सबको पत्ते बांटेंगे। जिसको पहला गुलाम मिलेगा, वह हुकुम मानेगा और जिसको पहला बादशाह मिलेगा वह हुकुम देगा। बादशाह जो बोलेगा, गुलाम को वही करना होगा। इसके बाद यह चलता रहेगा।” मुझे खेल रोचक लगा। मैं जानती थी हुक्म क्या होगा, और यह खेल कहां जाकर खत्म होगा। उधर कांता मुझे घूरे जा रही थी।

“ठीक है, हमें मंजूर है।” मैं बोली। खुश हो गये सब।

“सोच ले।”

“सोच लिया।”

“पीछे नहीं हटना है।”

“नहीं हटूंगी। सब खेल में शामिल हैं तो हमें क्या दिक्कत?”

“ई अनाड़ी को बता काहे नहीं देते कि असल में का करने वाले हो तुमलोग।” कांता बोल पड़ी।

“बताने का क्या जरूरत है? और तू काहे परेशान हो रही है। यह खुद ही खेलने को राजी है। वैसे भी, इस खेल में इसे भी मजा आएगा।” सलीम बोला। उसे कांता की बात पसंद नहीं आई। अच्छी खासी शिकार फंस रही है और यह छमिया व्यवधान पैदा करने का प्रयास कर रही है। उसे भय था कि खेल के बारे में पूरा सत्य जानकर कहीं मैं मना न कर दूं। “अब तू ज्यादा पटर पटर न कर।” डांट दिया उसने कांता को।

“तो हम ही बता देते हैं।” कांता खिसिया कर बोली। उसे खुद का महत्व घटने का भय सता रहा था शायद, या फिर मुझसे ईर्ष्या हो रही थी। मैं उसकी मनोभावों को खूब समझ रही थी।

“क्या बताएगी? बता।” मैं बोली।

“यही कि ई सब यहां क्या करने वाले हैं।”

“अब घुमा फिरा के काहे बोल रही है, सीधे बोल ना।” मैं मजे ले रही थी।

“उल्टा सीधा काम करवाएंगे।”

“कैसा उल्टा सीधा। हमसे न होगा क्या?”

“बुद्धू, गंदा काम करवाएंगे।”

“कैसा गंदा काम?” मैं जानती बूझती अनजान बन रही थी।

“तुम समझ नहीं रही हो।”

“तू खेल रही है ना?” मैं उल्टा सवाल दाग बैठी।

“हां।”

“तुम्हें मजा आता है ना खेलने में?”

“हां, काहे कि हमें आदत है।”

“जब तुझे मजा आता है तो हमें काहे मना कर रही है?”

“छोड़ो, हमें क्या, झेलो खुद, बाद में हमें दोष न देना कि चेतायी नहीं थी।” झल्ला कर बोली वह। सभी हंस पड़े।

“मर साली कुतिया।” बुदबुदाई वह।

“कुछ बोली का हमसे?” मैं बोली।

“नहीं कुछ नहीं। समझ जाएगी सब।” वह बोली।

“अब तुमलोग बकबक बंद करो। सब आ जाओ सेंटर टेबुल के चारों तरफ। अब खेल शुरू करते हैं।” सलीम बोला।

वहां उपस्थित सभी लोग सेंटर टेबल के चारों तरफ बैठ गये। जैसे ही मैं उन लोगों के बीच बैठी, बगल वाला मंगरु नाक सिकोड़ कर बोला, “उंह, महक रही है यह तो।”

“साले महक रही है? गौर से देख इसे। वैसे भी जब काम के बीच में गंधाती, महकती रेजाओं और मुंडू, खोकोन के साथ गोदाम में ठेल्लम ठेल्ली करते हो तब महक नहीं लगती है साले?” रफीक मेरी कमनीय देह को ललचाई, लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला। मैं सकुचाने का नाटक करती हुई और थोड़ा सिकुड़ कर बैठ गयी।

“सच कहा तूने सलीम। चल बांट पत्ते, रहा नहीं जा रहा है अब।” बेकरार बोदरा बोला। अब सलीम नें पत्ते बांटना आरंभ किया। सबसे पहले गुलाम निकला मंगरू का। वह खड़ा हो गया।

“मंगरू बन गया गुलाम।” सलीम नें घोषणा की। फिर बादशाह निकला मुंडू को। मुंडू खड़ा हो गया।

“हां, तो मंगरू मेरा गुलाम। जो हम कहेंगे वही करेगा ना?” मुंडू बोला।

‘हां, करेंगे।” आज्ञाकारी गुलाम की भांति मंगरू बोला।

“चल उतार मेरे कपड़े।” मुंडू बोला।

“जो हुकुम मालिक।” कहते हुए मुंडू के कपड़े उतारने लगा मंगरू।

“यह यह क क क क्या हो रहा है?” मैं अनजान बन कर चौंकने का नाटक करती हुई बोली।

“यही तो खेल है। बादशाह गुलाम को हुकुम करेगा और गुलाम हुकुम का पालन करेगा।” सलीम बोला।

“त त त तो सभी के साथ ऐसा ही होगा क्या?” मैं बोली।

“हां, लेकिन बादशाह जैसा बोलेगा वैसा होगा।”

“हम नहीं खेलेंगे ऐसा खेल।” मैं विरोध करने लगी।

“खेलना पड़ेगा। तुम्हीं बोली थी।”

“हमें का पता कि ऐसा भी करना पड़ेगा। छि:।” मैं खड़ी हो गयी। अबतक मुंडू नंगा हो चुका था। पूरा नंगा। कोई शर्म नहीं थी चेहरे पर। स्त्रियों की तरह बदन था उसका। सीना किसी नवयुवती की तरह उभरा हुआ था। किसी नवयुवती की तरह अर्धविकसित उरोजों की तरह उसके सीने के उभार थे। कमर सामान्य था किंतु नितंब उसके सामान्य से काफी बड़े बड़े थे, किसी खेली खाई व्यस्क स्त्री से भी बड़े। सारा शरीर बाल रहित चिकना। सामने झूल रहा था मात्र तीन इंच का लिंग। अजीब व्यक्तित्व था उसका।

“अब कहां? चल बैठ। पहले कह रही थी तो समझ नहीं आया।” कांता की बात से मेरा ध्यान भंग हुआ।

“नहीं, हम नहीं खेलेंगे ई गंदा खेल।” मैं बोली।

“अब कोई उपाय नहीं है। बैठ जा।” सलीम हुक्म दे रहा था।

“नहीं।”

“मैडम को बता देंगे, तू हमारी बात नहीं सुनी।”

“दीदी को पता है क्या, कि ई सब भी करते हो तुम लोग?”

“और नहीं तो क्या। इसी लिए तो बुलाई है और आए हैं हम।”

“हाय दैया। दीदी भी?”

“हां मैडम भी। बुलाई तो है यही सब खेलने के लिए।”

“हाय रा्आ्आ्आ्आम ऐस्स्स्स्आ्आ्आ।” मैं बनावटी आश्चर्य से आंखें बड़ी बड़ी करके नादान बनने का ढोंग कर रही थी।

“हांआ्आ्आ्आ ऐस्स्स्स्आ्आ्आ। चल अब बैठ जा चुपचाप।” मेरी नकल उतारती हुई कांता बोली। मैं वापस बैठने को बाध्य हो गयी।

“लेकिन यह तो बड़ी बेशर्मी वाला खेल है।” मैं बोली।

“हां, लेकिन हम खेलते हैं। बड़ा मजा आता है। आगे आगे देख, और क्या क्या होता है।”

“हे भगवान, हमें लाज आती है।” मैं बोली।

“खतम हो जाएगी तेरी भी लाज। चलिए भाई मुंडू, आप बादशाह हैंं और मंगरू आपका गुलाम। आगे बोलिए मंगरू से क्या करवाना है।” सलीम बोला।

“खोल अपने कपड़े रे मंगरू।” मुंडू मंगरू से बोला। मंगरू आज्ञाकारी गुलाम की भांंति अपने कपड़े खोलने में व्यस्त हो गया। जैसे जैसे उसके कपड़े खुलते गये, एक एक करके उसके सुगठित शरीर के हिस्से बेपर्दा होते गये। उफ्फ, जब वह पूर्णतया नग्न हुआ, पूरा कामदेव का अवतार लग रहा था। रंग काला था तो क्या हुआ, उसका गठा हुआ छ: फुटा शरीर मेरी नजरों के आगे चमक उठा। रोम रोम सुलग उठा मेरा। धमनियों में रक्त का संचार द्रुत गति से प्रवाहित होने लगा। उसकी जंघाओं के मध्य झूमता तनतनाया तीन इंच मोटा और करीब नौ इंच लंबा दर्शनीय, खूबसूरत किंतु भयावह लिंग हमारी नजरों के सम्मुख नृत्य कर रहा था।

“अब का हुकुम है महाराज?” नंग धड़ंग मंगरू बोला।

“चल अब चाट हमारा गांड़।” मुंडू बोला और झुक गया।

“जो हुकुम महाराज।” मंगरू बोला और मुंडू की चिकनी गुदा को चाटने लगा, किसी कुत्ते की तरह, सटासट।

“अच्छी तरह से चाट गधे।” मुंडू आनंदित होता हुआ बोला, और मंगरू चपाचप चाटता रहा। मुंडू के नितंबों की दरार को फैला कर चाटने लगा। मलद्वार में जीभ घुसा घुसा कर चाटता रहा। मेरी नजर तो सिर्फ मंगरू के आकर्षक लिंग पर ही चिपकी हुई थी। काश मुंडू की जगह मैं होती, कितना मजा आता। मेरी मुखमुद्रा सलीम और रफीक की नजरों से छिपी न थी। सलीम तो मेरे वक्षस्थल को घूरे जा रहा था।

“इनको लगे रहने दो। चलो बाकी लोग खेल को आगे बढ़ाते हैं।” सलीम की घोषणा से मेरी तंद्रा भंग हुई। अगला गुलाम निकला रफीक और बादशाह निकला कांता को। अब? अब क्या होगा? बड़ी दिलचस्प स्थिति थी। मगर कांता ठहरी एक नंबर की खिलंदड़।

स्थिति को अपने काबू में ले कर बोली, “हां, तो हमारे गुलाम, चल जल्दी से उतार अपने कपड़े।”

“जो आज्ञा महारानी जी।” कहते हुए रफीक खड़े हो कर बड़ी बेसब्री और जल्द बाजी से अपने कपड़ों से मुक्त होने लगा। उसकी हालत देखकर सबकी हंसी छूट पड़ी। वह हरामजादी बेशरम कांता खड़ी देख रही थी। उसकी आंखों में वासना की खुमारी स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। चंचला, कामुकता की पुड़िया कांता की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। बेचैनी, बेसब्री, उसके चेहरे पर भी खेल रही थी।

“यही सब होगा क्या?” मैं बोल उठी।

“हां, यही सब होगा।” सलीम बोला।

“छि:, तुम सब गंदे हो।”

“तुम गंदी नहीं हो?” सलीम बोला।

“हूं, मगर ऐसी नहीं।”

“क्या फर्क पड़ता है?”

“पड़ता है।”

“कैसे?”

“तुम सब भीतर से गंदे हो और हम बाहर से।”

“भीतर बाहर में फर्क क्या है? गंदगी तो गंदगी है।”

“हम ई सब नहीं जानते।”

“जान जाओगी। भीतर बाहर में ही तो मजा है, जान जाओगी।”

“हमें नहीं जानना।”

“सिखा देंगे।”

“हमें नहीं सीखना।”

“खेल से हट नहीं सकती तुम।”

“हाय, हम कहां फंस गये।” मैं बेबसी का दिखावा करती हुई बोली। मेरी बातें सुनकर सभी हंस पड़े। अबतक रफीक नंगा हो चुका था। दिन की रोशनी में उस काले टकले दढ़ियल, लिक्कड़ पहलवान का शरीर बड़ा अजीब लग रहा था। उसकी जांघों के बीच उसका साढ़े छ: इंच लंबा काला, खतना किया हुआ लिंग उठक बैठक कर रहा था।

“अब का हुकुम है?” रफीक बोला।

“अब ई भी बताना होगा हरामी, उतार हमारे कपड़े और करले जो करना है।” पैर पटकती हुई कांता बोली। कहने की देर थी कि रफीक ने कांता पर ऐसा झपट्टा मारा जैसे बाज किसी चिड़िया पर। पलक झपकते कांता नंगी हो गयी। साली छटंकी सी दिखने वाली कांता कम सेक्सी नहीं थी। चेहरे से ज्यादा आकर्षक तो उसके तन का गठन था। सख्त उन्नत उरोज, पतली कमर, उभरे हुए नितंब और और और नाभी से नीचे, सामने काले काले झांट और नीचे चमचमाती चिकनी योनि। योनि चीख चीख कर उसके लंडखोर होने की चुगली कर रही थी। मैं अंदर ही अंदर गनगना उठी। उफ्फ, मेरा नंबर कब आएगा, इंतजार कुछ अधिक ही लंबा हो रहा था। मेरी योनि पनिया उठी थी अबतक।

“अब काहे चाट रहा है मादरचोद। ठूंस अपना लौड़ा मेरी गांड़ में। चोद हरामी चोद।” उधर उत्तेजित मुंडू के मुख से निकला। हमारा ध्यान उधर गया तो क्या देखते हैं, मंगरू, जिसे मुंडू की गांड़ चोदने का लाईसेंस मिल गया था, मुंडू की गुदा और अपने तनतनाए लिंग पर थूक लसेड़ कर अच्छी तरह से मुंडू की कमर धर के एक ही धक्के में सरसरा कर पूरा का पूरा लिंग धांस दिया।

“आ्आ्आ्आ्ह” मुंडू की आह निकल गयी। मुंडू गांडू, गांड़ मरवाने का अभ्यस्त, आराम से अपनी गांड़ में खा गया मंगरू का विशाल लिंग, आनंद से उसकी आंखें बंद थीं।

“ले स्स्स्स्स्आल्ल्ल्ले गांडू, हुम्म्म्म्आ्आ्आ्।” उसकी स्त्रियों समान उभरे सीने के उभारों को मसलते हुए मंगरू ठूंस दिया जड़ तक अपना लिंग उसकी गुदा में।

“चोद मेरे गांड़ के रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह साले चोद।” मुंडू आनंदित हो कर बोला।

“हां महाराज, चोद रहे हैं, ले ले ले।” कहते हुए कुत्ते की तरह कचकचा कर चोदने लगा।

“अरे टकले दढ़ियल हलकट, उधर का देख रहा है, हमको कर ना। कब से मरे जा रहे हैं लंड खाने के लिए।” कमीनी, लंडखोर कांता कलकला कर बोली। और फिर क्या था, बिना किसी भूमिका के रफीक पिल पड़ा कांता पर। वहीं फर्श पर कांता को पटक कर चढ़ बैठा उस पर, उसके दोनों पैरों को सरका कर सट्टाक से अपना लपलपाता लिंग उसकी लसलसी योनि में उतार दिया।

“ले साली कुत्ती, ले आ्आ्आ्आ्ह।” रफीक की कमर नें जुंबिश ली और लो, हो गया कांता का उद्धार।

“आह मादरचोद, ओह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह,” कांता मुदित हो कर अपनी अपने पैरों से रफीक की कमर को लपेट ली और संभोग के सुखद संसार में गोते खाने लगी। शुरू हो गयी उनकी छपाक छैंया।

“सबके सब हरामी, एक नंबर के हरामी हैं। हम नहीं खेलते यह गंदा खेल।” मैं बोली और उठने को हुई।

“जाती कहां है बुरचोदी अब। साली रंडी खेलने आई है, खेलना तो होगा ही। चल सलीम पत्ते फेंक।” बोदरा अब अपनी औकात पर आ चुका था, मुझे पकड़ कर जबरदस्ती बैठाते हुए बोला। अब बचे थे तीन कुली, जिनके नाम बुधुवा, हीरा, बोयो, मिस्त्री बोदरा, सलीम और रेजा सोमरी। सलीम पत्ते बांटने लगा। इस बार तीन गुलाम एक के बाद एक निकले। पता है? कौन कौन थे? बुधुवा, हीरा और मैं। तीन गुलाम।

“नहीं, हम नहीं।” मैं फिर विरोध करने लगी।

“चुप साली रंडी। एकदम चुप। चल, अब तू भाग नहीं सकती खेल के बीच में खेल छोड़कर। बुधुवा, हीरा और तू गुलाम। चल सलीम आगे बांट पत्ते, देखें तो बादशाह कौन है?” बोदरा डांट कर बोला। उत्तेजना के मारे बुरा हाल था उसका और यही हाल मेरा भी था। परिणाम निकलते ही मेरी योनि खुद ब खुद पानी छोड़ने लगी। सलीम नें पत्ता बांटा और बादशाह बना बोदरा, उसके मनोनुकूल परिणाम था। उछल ही तो पड़ा। न जाने कब से इसी ताक में था। तुरंत बोला, “चल, तीनों के तीनों अपने कपड़े उतारो।”

“नहीं, हम नहीं।” मैं बोली।

“चल रे बुधुवा और हीरा, धर साली को और उतार इस रंडी के कपड़े। कब से फड़फड़ा रही है, हम नहीं हम नहीं।” कहते हुए खुद अपने कपड़े खोलने में व्यस्त हो गया। इधर बुधुवा और हीरा मुझ पर टूट पड़े। दोनों के दोनों, काले कलूटे अठाईस तीस की उम्र के साढ़े पांच फुट कद वाले गठे मजदूर, मुझे दबोच कर पलक झपकते साड़ी ब्लाऊज से मुक्त कर दिया। पुरानी, गंदी साड़ी, पेटीकोट और ब्लाऊज, जल्दबाजी और खींच तान कर खोलने के क्रम में खुलते खुलते कई जगह चरचरा कर फटती चली गयी। उफ्फ्फ। खोलते खोलते वे हरामजादे, मेरे वक्षों को और नितंबों को दबाने से भी बाज नहीं आ रहे थे।

“नहीं, छोड़ो हमें।”

“हां हां, नहीं छोड़ेंगे। अईसे भी ई तो महाराज का हुकुम है। छि:, बहुत गंदी है रे तू, कैसी तो महक रही है, मगर है मस्त माल।” नाक सिकोड़ता बुधुवा बड़ा खुश नजर आ रहा था। इधर बोदरा को कहां सब्र, इससे पहले कि मैं पूर्ण वस्त्रविहीन होती, वह मादरजात नंगा हो चुका था। साला चुदक्कड़ बौना। बौना बनमानुष हरामी। मेरी फटी चड्ढी, जिससे मेरी फूली हुई योनि झांक रही थी और बमुश्किल पहनी गयी फटी ब्रा, जिससे मेरे उरोज छलक कर बाहर आने को बेताब, देख कर फटी की फटी रह गयीं उन सबकी आंखें।

“वाह वाह। साली छिनाल, इतने मस्त बदन को लेकर भिखमंगी बनी पड़ी है। सलीम भाई, लॉटरी निकली है रे, देख तो जरा, मैडम से एक पैसा कम नहीं है। एक नंबर की लंडखोर लग रही है और बड़ी शरीफजादी बन रही थी हरामजादी। लंडखोर मैडम की लंडखोर बहिन।” बोदरा मुझे ऊपर से नीचे लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला। उसका सात इंच का मोटा मूसल मेरे सामने सलामी दे रहा था। गनगना उठी मैं। मैं बुधुवा और हीरा की पकड़ में छटपटा रही थी।

“नहींंईंईंईंईंईंईंईं, हम अईसे नहीं हैं। छोड़ दो छोड़ दो हमें। बरबाद मत करो हमें।” मैं गिड़गिड़ाने लगी, लेकिन मेरी नजरें बोदरा के लिंग पर ही गड़ी थीं।

“अब क्या बरबाद? आबाद हो जाएगी रे। देख उधर मंगरू को, मुंडू को कईसे चोद रहा है। देख उधर रफीक को, कांता को कईसे चोद रहा है। देख के मजा नहीं आ रहा है? इधर मेरा लंड देख, इसी से देंगे, ऐसा ही मजा देंगे हम भी। अरे बेटीचोद बुधुवा और हीरा, अब बोलना पड़ेगा कि तुमलोग भी नंगे हो जाओ?” बोदरा भूखे भेड़िए की तरह मेरी ओर बढ़ता हुआ बोला।

“इसका चुचकसना और चड्ढी?”

“फाड़ दे, फटी तो हईए है।” कहने की देर थी कि पलक झपकते मेरी ब्रा और पैंटी की दुर्दशा हो गयी। पल भर में मेरी ब्रा और पैंटी चरचरा कर धूल चाटने लगी।

“हाय रा्आआ््आआम”, हो गयी मैं मादरजात नंगी। गंदे शरीर के बावजूद चमक उठी मेरी कमनीय काया। मेरे उन्नत, भरे भरे उरोज अपने पूरे शबाब पर दमक उठे। मेरी पनिया उठी फूली, फुदकती योनि चमक रही थी। मेरे गुदाज नितंबों की छटा से सम्मोहित हो उठे सब के सब। संभोगरत मंगरू और रफीक भी गर्दन घुमा कर मेरे चित्ताकर्षक जिस्म को ललायित नजरों से घूर रहे थे।

“गजब, साली के बदन को देखो तो, मैडम से कुछ भी अलग है का? चूची एकदम फुटबॉल है,  मां की लौड़ी बुरचोदी, तब से कैसे शरीफ बन रही थी। चूत को देखो, लगता है किसी गधे से चुदवाती रहती है, बड़ी सती सावित्री बन रही थी। इसकी चूत पर सूखी मलाई? ई का है? लगता है कल ही खूब चुदवाई है रंडी कहीं की, साली बुरचोदी। गोल गोल चिकना चर्बीदार गांड़ देख ई रंडी का।” कहते हुए मुझ पर किसी बाज की तरह झपट पड़ा साला बौना बनमानुष।

“ऊ रंडी को ही देखते रहोगे कि चोदोगे भी साले चूतखोर बेटीचोद मां के लंड।” कांता इस आनंदमय संभोग के पलों में रफीक के लिक्कड़ शरीर से गुंथी क्षणिक विराम से कलकला कर बोली। और जारी रहा उसके तन का मर्दन, नुचाई, चुदाई, घिसाई।

“और तू मादरचोद मंगरू, रुक नहीं, चोदता रह चोदता रह, आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह।” वासना के सैलाब में बहते व्यवधान से तड़पता मुंडू तिलमिला कर बोला। और धपाधप, फचाफच होती रही उसके गांड़ की कुटाई। इधर मुझे लिए दिए बोदरा सोफे पर चढ़ बैठा।

“बस बस, अब मैडम आए न आए, फरक नहीं। ई मैडम से किसी बात में कम नहीं है। समझ लेंगे मैडम ही को चोद रहे हैं। कल मैडम की गांड़ चोदा, आज समझ लेंगे कि मैडम की बुर को चोद रहे हैं। अब मैडम आए न आए, हमारे लौड़े से, यही है आज हमारी रंडी मैडम। साली कुतिया कितनी बुरी महक रही है, लग रहा है जैसे न जाने कितने दिन से नहीं नहाई है। हमारे रेजा लोग भी इतना नहीं महकते हैं। साली भिखमंगी कहीं की, मगर चलेगा, खूब चलेगा। साली भिखमंगी की तरह गंदी, मगर बदन तो देखो हरामजादी की, खूब मस्त पायी है। मजा आ गया, अहा ओहो।” किलक रहा था।

“हट, हट, नहीं नहीं। न करो, ओह मां, ओह कहां फंस गये हम, हाय हाय, मत करो ना, छोड़ दो आह्ह।” मैं उस बौने के नीचे पिसती हुई बेबस, रोने गिड़गिड़ाने का अभिनय करने लगी।

“छोड़ दें? ऐसे कैसे छोड़ दें। अभी तो तू मेरी गुलाम है। गुलाम को ऐसे कैसे छोड़ दें। हमारी मरजी। जो चाहे करेंगे। पहले हम चोदेंगे, फिर हमारे गुलाम हीरा और बुधुवा भी चोदेंगे। हम समझ गये हैं कि तू कितनी बड़ी लौड़ाखोर है। अब रोने चिल्लाने का कोई नाटक नहीं चलेगा हरामजादी।” बोदरा मेरे यौनांगों को मसलते हुए बोला।

“ठीक, ठीक, ई एकदम मैडम ही लग रही है। मैडम की तरह रंडी। तू चोद, फिर हम भी आते हैं इनको निपटा के।” सलीम बोल उठा और पत्ते बांटने लगा बचे हुए लोगों के बीच। बोयो और सलीम बने गुलाम और सोमरी बनी बादशाह, या यों कहें बेगम।

“बहुत देर से नंबर आया। अब देर काहे? चल रे सलीम, शुरू हो जा। तब से ई सबका तमाशा देख देख के बदन में आग लगा हुआ है। जल्दी कर मादरचोद। साड़ी उठा के चोद हमको। और तू बोयो, हमारा दूध पियो, लो।” कहते हुए खुद ही अपना ब्लाऊज खोल बैठी। बिना ब्रा के थी वह। थलथला कर उसके किलो किलो भर के बड़े बड़े थन बेपर्दा हो गये। कहने की देर थी कि बोयो टूट पड़ा उसके स्तनों पर और बारी बारी से चीपने लगा और चपाचप चूसने लगा। बिना पैंटी की झांटों भरी चर्बीदार चूत, साड़ी उठते ही नुमायां हो उठी। और फिर क्या था, सलीम नें भी कमीज उतारने की जहमत नहीं उठाई, चड्ढी समेत तुरंत ही पैंट नीचे सरका कर चढ़ दौड़ा सोमरी के काले गोल मटोल गठीले शरीर पर। ये तीनों अबतक न जाने कैसे अपने को नियंत्रण में रखे हुए थे। गुत्थमगुत्था हो गये और जंगली जानवरों की तरह नोच खसोट पर उतर आए। उफ पूरा ड्राईंग रूम कामुकता का अखाड़ा बन चुका था। उधर मंगरू मुंडू, कांता रफीक की धींगामुश्ती, इधर सलीम, बोयो और सोमरी के बीच धकमपेल और मैं?

“आ्आ्आ्आ्ह, ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़,” चीख पड़ी मैं, जब बोदरा अपना मूसल मेरी योनि को चीरता हुआ घुसाता चला गया, घप्प से। आप लोगों को बताने की आवश्यकता नहीं कि यह मेरा नाटक था। बुधुवा और हीरा मेरे तन को नोचने खसोटने, रगड़ने घसड़ने, चूमने चाटने और और अपनी दरिंदगी भरी हरकतों से मुझे हलकान करने में पीछे नहीं थे।

“चिल्ला, खूब चिल्ला, हर्र्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आमजादी। आ्आ्आ्आ्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह।” खूंखार भेड़िए की तरह गुर्रा उठा बोदरा और मेरी छाती में दांत गड़ा बैठा।

“आ्आ्आ्आ्आआ््आआ््आआ मां्आं्आं्आं।” मैं दर्द से बिलबिला उठी। “इस्स्स्स्स्स्स्स मर गय्य्य्य्य्यी्ई्ई्ई्ई। आ्आ्आ्आ्ह बरबाद हो गयी आ्आ्आ्आ्ह।” बोदरा के भीमकाय लिंग से बिंधी मैं रोने लगी, छटपटाने लगी।

“हो गया रे हो गया, बस बस अब तू मजा ले, देख कैसे मजा देते हैं तुम्हें।” बोदरा की आवाज में सहानुभूति कम वहशीयत ज्यादा थी। भूखे भेड़िए को अपना शिकार जो मिल गया था। उसके भीमकाय लिंग को उसकी मंजिल जो मिल गयी थी, स्वर्गीय सुख का मार्ग जो मिल गया था, समागम का, संभोग का, वासना के सुखद समुंदर में डूब डूब कर उतराने का, चुदाई का, कुटाई का। किसी मशीन की तरह मेरी चूतड़ को दबोच कर गचागच चोदने में मशगूल हो गया। दंगल शुरू हो गया और मैं हरामजादी, कमीनी, लंडखोर, गलीज, घटिया कुतिया, हर संभव अभिनय को अंजाम देती हुई मगन, मुदित, उस घृणित कृत्य के हरेक कामुक पलों का रसस्वादन कर रही थी। उसके बाद तो मेरी बेध्यानी में मेरी कमर खुद ब खुद चलने लगी थी। न चाहते हुए भी मेरी सिसकारी निकल पड़ी।

“आ आ आ आ उ उ उ इस इस इस सी्ई्ई्ई्। अम अम इस्स्स्ई्ई्ई।”

“आ रहा है हां हां हां हुम हुम हुम मजा आ रहा है ना है ना आह आह हुं हुं हुं।” धक्के पे धक्का, धकाधक कूटते हुए मेरी चूतड़ों को मसलते हुए हांफते हांफते बोला।

“न्न्न्न्न्नहीं्ईं्ईं्ईं।” मैं मचलते हुए बोली।

“झूठ।”

“नननननहींईंईंईं सच्च्च्च।”

“हट्ट्ट्ट्ट झूठी आह आह।”

“ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़, सच्च्च्चीईईईई।”

“ले ले आ आ ओ ओ ले हुं हुं। झूठ चाहे सच, ले और ले साली रंडी, लौड़ा्आ्आ्आ्आ आह ओह मेरा लौड़ा ले ले ले हुं हुं हुं।”

“नई आह नई ओह नई”

“हां आह हां ओह हां।” करीब बीस मिनट तक बोदरा मुझे झिंझोड़ता रहा, निचोड़ता रहा। उस दौरान मैं हर दस मिनट में झड़ी। ओह और क्या खूब झड़ी। मेरी स्थिति को बखूबी समझ रहा था वह अनुभवी औरतखोर, ठिगना बौना, बनमानुष। मेरे शरीर का अकड़ना, फिर शिथिल होना, उसके कमर पर मेरे पैरों के बंधन का सख्त होना, फिर ढीला होना, मेरा उसके शरीर से चिपकना और निढाल होना, सब समझ रहा था वह औरतखोर। “बन गयी न बुरचोदी आह, बन गयी न रंडी, ओह बन गयी न चूतमरानी रंडी मां की चूत, साली आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह,” कहते हुए मुझसे ऐसे चिपका मानो मेरी सांसें बंद करके ही दम लेगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं उसके स्खलन से निहाल, उसके लिंग से उगलते लावे का कतरा कतरा अपनी योनि के अंदर जज्ब करती चली गयी। वह हटा मेरे निढाल शरीर पर से, लेकिन यह अंत नहीं था।

“अब तू का देख रहा है मादरचोद बुधुवा। चोद हरामजादी को।” बोदरा के मुंह से निकले अल्फाज अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि या अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, बुधुवा सवार, वह चढ़ दौड़ा मुझ पर और इससे पहले कि मैं पल भर भी सुस्ता पाती, भचाक, और लो, मेरे निढाल जिस्म की चुदी चुदाई गीली चूत में दूसरा लंड। छ: इंच का लंड और औसत मोटाई का लंड घुसता चला गया मेरी चुदी चुदाई योनि में सर्र से। कुत्ते की तरह, बिल्कुल जैसे एक कुतिया के पीछे पड़े अपनी बारी का इंतजार करते कुत्ते की तरह लगा भकाभक चोदने, मूक पशु की तरह। यह कसरती चुदक्कड़ कुछ अधिक ही जोश में था। पंद्रह मिनट में ही निपट गया, छर्र छर्र झाड़ बैठा अपना वीर्य। मैं तड़प उठी, क्योंकि अभी मैं झड़ने वाली ही थी कि बुधुवा साला भड़वा, नामर्द फारिग हो गया, लेकिन अभी असली मर्द तो बाकी था।

“हीरा बेटीचोद, चढ़ जा रे चढ़ जा।” बादशाह बोदरा का हुकुम और हो गया मेरी चूत का बंटाधार। मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि हीरा सचमुच का हीरा है। काला कलूटा, कद तो करीब साढ़े पांच फुट, लेकिन लिंग? बाप रे बाप, ध्यान नहीं दिया था मैंने कि उसका लिंग करीब दस इंच तक लंबा हो चुका है, मेरी चूत को हलाल करने को।

“लीजिए महाराज, ये ये ये आया हीरा का खीरा।” कूद कर चढ़ा था मुझे भंभोड़ने। सचमुच उसके लिंग के स्थान पर एक भीमकाय खीरा लटक रहा था। किसी गधे के लिंग सरीखा। चुद तो चुकी थी रामलाल तथा अपने निग्रो बॉस के मोटे मोटे लंबे लिंग से, लेकिन आज का चुदना कुछ अलग था। इसे मैंने खुद पर बलात्कार का रुप दे दिया था। अपने ऊपर बलात्कार होते हुए चुदने का रोमांच अलग था।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।” ज्योंहि हीरा के खीरे का संपर्क मेरी योनि पर हुआ, मैं भयभीत स्वर में चीख उठी।

“साली कुतिया, मेरी बारी आई तो नहीं।” हीरा डांटने लगा। वाह, यह तो कमाल हो गया। कहां तो कल तक मैडम का आदर पा रही थी, आज अचानक मेरे गरीब देहातिन जैसे परिवर्तित व्यक्तित्व को पहचान न पाने के कारण निकृष्ट व्यवहार का शिकार हो रही थी। खैर, यही तो चाहती थी मैं कि मेरे साथ वे बेखौफ, बेझिझक होकर, मनमाफिक व्यवहार करें। वही हो रहा था मेरे साथ। इधर मुझ अतृप्त लंडखोर को और क्या चाहिए था। लेती चली गयी उतना लंबा और मोटा लिंग अपनी अनबुझी वासना की अग्नि में झुलसती योनि में। थक चुकी थी मैं मगर शरीर ही थका था, मन नहीं भरा था। इधर उसका लिंग घुसा नहीं कि मैं तड़प उठी। यह तो पूरा जंगली था। नोच खसोट पर उतर आया। मेरी चूचियों का मलीदा बनाने लगा और मेरी गर्दन के नीचे जोश के मारे दांत गड़ा बैठा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नहींंईं्ईं्ईं्ईं्ईं” दर्द से चीख पड़ी मैं। सबकी नजरें मेरी ओर उठी और सभी मेरे तन की दुर्दशा होते हुए मजे से देख रहे थे। मंगरू और रफीक निपट चुके थे अपने अपने संगियों से। अब तक उधर सलीम और बोयो सोमरी की ऐसी की तैसी किये जा रहे थे और इधर मेरे ऊपर तीसरा चुदक्कड़ सवार था। उसके दस इंच लंबे मूसल का अंतहीन प्रहार झेलती मैं सिर्फ पांंच मिनट ही ठहर पाई। वह मुझ पर जिस ढंग से पिला हुआ था, जिस ढंग से ठापों का क्रम था उसका, भक भक भक भक भचाक, भक भक भक भक भचाक, इतना उत्तेजक था कि मैं तुरंत ही खल्लास होने को वाध्य हो गयी। रोक ही नहीं पाई खुद को, उफ्फ्फ, आनंद का पारावार न रहा। झड़ गयी, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह। मगर अभी कहाँ, वह तो डटा हुआ था, लगातार गचागच चोदना चालू था। मैं शिथिल हो रही हूं या डटी हुई हूं, क्या परवाह उसे। करीब आधे घंटे तक कूटता रहा मुझे। थका कर मुझे अर्धमूर्छित अवस्था में पहुंचा दिया उसनें मुझे। नहीं नहीं करती रही, मना करती रही, सिर्फ म़ुह से, शारीरिक भाषा कुछ और कह रही थी, मेरी कमर चल रही थी, खुद ब खुद ऊपर उछल उछल कर लंड खा रही थी। थक रही थी, निचुड़ रही थी, पिस रही थी किंतु चुदती रही, चुदती रही, चुदती चुदती निहाल हो गयी मैं। उस आधे घंटे में मैं तीन बार झड़ी और निर्जीव सी हो गयी। हीरा अंततः पसीने से लतपत, मेरे निर्जीव पड़े शरीर को कचकचा कर कसा और वीर्य का फौव्वारा छोड़ने लगा मेरी कोख में, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, गय्य्य्य्या।” फिर छोड़ा, अलग हुआ मुझ से। तोड़ कर रख दिया था उसने मुझे। मेरी आंखें बंद थीं। मैं लंबी लंबी सांसें ले रही थी। तभी कोई और मुझ पर सवार होने लगा।                         “उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, नननननहींईंईंईं, और नहीं।” मैं कलप उठी। बमुश्किल आंखें खोल कर देखी, यह मंगरू था। साला हरामी मुंडू की गांड़ चोद कर अब मुझ पर चढ़ दौड़ा था।

“क्या नहीं? तुमको नहीं चोदा तो क्या चोदा।” वह मुंडू को चोदने के बाद फिर तैयार हो चुका था। वह छ: फुटा दानव, मेरी निर्जीव देह पर सवारी गांठने का मानों इंतजार ही कर रहा था। “सोचा था मैडम को चोदने का मौका मिलेगा। कोई बात नहीं, मैडम न सही मैडम की बहिन ही सही। मैडम से कम थोड़ी न हो तुम।” बड़ा गंदा था वह। उसके शरीर से बेहद गंदी बास आ रही थी। उसके लिंग पर मुंडू की गुदा से निकला मल भी लिथड़ा हुआ सूख चुका था, वैसे ही गंदा लिंग मेरी चुद चुद कर बेहाल चूत में ठूंसने लगा।

“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईं, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं कराह उठी। “यह तो खेल का हिस्सा नहीं है?” विरोध की शक्ति थी नहीं। कितनी गंदी बन चुकी थी मैं। अपनी हालत पर बड़ी घिन हो रही थी मुझे।

“हट रंडी्ई्ई्ई्ई्ई कुत्ती। नहीं बोलती है साली बुरचोदी, चुपचाप चोदने दे। खेल वेल भूल जा कुत्ती कहीं की। अभी तो बाकी लोग भी चोदेंगे तुमको।” कहते हुए मेरे बेजान से शरीर को नोचने खसोटने लगा। मैं बेहाल, नुचती रही चुदती रही। पूरा लिंग सर्र से मेरी योनि मेंं सरका कर सटासट लगा ससेटने। करीब पच्चीस मिनट तक नोचते खसोटते चोदता रहा और जब चोदकर अलग हुआ तो मेरी चूत का भोंसड़ा बन चुका था। मुंडू का सूखा मल अब भीग कर मेरी भोंसड़ा बन चुकी चूत के अंदर बाहर लिथड़ चुका था। छि:, मैं क्या बन चुकी थी। अब तो विरोध की कोई औपचारिकता भी नहीं कर सकती थी। अभी मंगरू हटा, कि रफीक आ चढ़ा। वह लिक्कड़ मादरचोद मेरे जिस्म को ऐसे भंभोड़ने लगा मानो किसी मरे हुए जानवर की लाश भंभोड़ भंभोड़ कर खा रहा हो। उसके निबटते निबटते बोयो आ धमका। बोयो कम कमीना नहीं था। सीधा सादा सा दिखने वाला लौंडा कम हरामी नहीं था। अभी अभी सोमरी को चोद रहा था, अब सोमरी की चूत के रस और खुद के वीर्य से सना लंड मेरे मुंह में ठूंसने लगा।

“नहीं।” मैं बुदबुदाई।

“मुंह खोल हरामजादी।” एक थप्पड़ लगा दिया मेरे गाल पर। बेबस, लाचार, मुंह खोलने में ही भलाई थी। बोयो का गंदा लिंग अब मेरे मुंह में था।

“चूस।”

“ऊं्ऊं्ऊं्ऊ।” यह मना था मेरा। एक झापड़ और पड़ा मेरे गाल पर, और मैं चूसने लगी उसका गंदा लिंग। उबकाई आ रही थी किंतु चूसने को वाध्य थी या ऐसा दिखा रही थी, लेकिन चूसने लगी। दिखा रही थी कि मैं बेबसी में चूसने को वाध्य हूं लेकिन मजा आ रहा था मुझे। वह हरामी इस गलतफहमी में था कि मुझपर जबर्दस्ती कर रहा है और इसमें खुश था वह। इधर अबतक सलीम भी आ पहुंचा था। वह बिना कुछ बोले, यंत्र चालित सा मुझ पर सवार हो कर मेरे भोंसड़ा बन चुके चूत का कचूमर निकालने में मशगूल हो गया। मेरी आंखों से अब बेबसी के आंसू बह निकले, मैं नौटंकीबाज कम थोड़ी न थी। मैं सोच रही थी कि अपनी इस जोखिम भरी अपनी कामुक यात्रा में यह मैं क्या बन गयी। रंडी से भी बदतर स्थिति थी मेरी। जानबूझकर आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर बैठी थी मैं। सिर्फ गों गों की आवाज निकल रही थी मेरे मुंह से। बीस मिनट तक सलीम नें चोदा मुझे और उसके हटते ही बोयो कूदकर चढ़ गया मुझ पर। बोयो ठीक हीरा की तरह ही था। वह भी जंगली कमीना मादरचोद, आव देखा न ताव, भक्क से भोंक बैठा अपना लंड और भकाभक भकाभक लगा चोदने। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, वे करीब चार घंटे, अंतहीन चार घंटे, करीब करीब मार ही डाला था उन्होंने मुझे। बोयो जब चोद कर हटा तो मैं हिलने डुलने के काबिल भी नहीं रह गयी थी। ऐसी कुतिया की तरह हालत हो गयी थी मेरी, जिसे मुहल्ले के सारे कुत्ते लाईन लगा कर चोद कर हटे हों।

“हो गया तेरा? बड़ी आई थी खेलने” कांता मजा लेते हुए बोल रही थी। मैं बड़ी मुश्किल से आंखें खोली। देखी, सभी मेरे चारों ओर खड़े संतुष्ट, मुस्कुरा रहे थे। नुच चुद कर बेहाल थी, मगर तृप्त थी और मैं मन ही मन हंस रही थी उनको बेवकूफ बनाते हुए अपनी मनोकामना पूर्ण करने में सफलता हासिल करने पर।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरी कराह निकली। बोल नहीं पायी कुछ।

“हो गया रे चांदनी। अब तू चांदनी से हो गयी हमारी चोदनी।” सलीम बोला।

“हां, हम सबकी चोदनी।” बोदरा बोला।

“लेकिन मैडम अब तक नहीं पहुंची।” रफीक बोला।

“का फरक पड़ता है। मजा तो खूब किया। एक और चोदनी जो मिल गयी। देख इसकी चूचियों को, चूत को, गांड़ को, मस्त माल मिली चोदने को।” सलीम बोला।

“अरे एक बज रहा है। खाना का क्या होगा?” यह मंगरू था।

“अबे मादरचोद, तुमको खाने की पड़ी है साले पेटू।” रफीक बोला। मैं कराहती हुई दाहिने हाथ से टेबुल की ओर इशारा किया।

“क्या है?”

“मोओओबा्आई्ईल।” बड़ी मुश्किल से बोल फूटे मेरे मुंह से। कांता अजीब नजरों से देखती हुई टेबल से मोबाइल ले आई। मैंने एक रेस्टोरेंट का नंबर लगाया और सबके खाने का ऑर्डर दिया। सभी बड़े चकित थे। किंकर्तव्यविमूढ़ थे। क्या मैं अबतक उन्हें बेवकूफ बना रही थी? अपने अपने स्थान में वे जम से गये थे। ऑर्डर देकर मैं फिर लुढ़क गयी। करीब एक घंटे बाद मैं थोड़ी संभली। अबतक वे पशोपेश में थे। मैंने उन्हें इत्मीनान रखने का आश्वासन दिया हाथ के इशारे से और उन्हें बैठने का इशारा करते हुए लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ी। जब मैं कमरे से बाहर आई, मैं बदल चुकी थी, अब मैं चांदनी नहीं, कामिनी थी। लेकिन मेरी चाल बदली हुई थी। चुदी जो थी कुतिया की तरह। चूत की चटनी जो बन चुकी थी। बुर का भुर्ता जो बन चुका था।

.      “अरे मैडम?”

“हां मैं, चांदनी।” सन्नाटा सा छा गया वहां। “क्या हुआ?”

“ककककुछ नननननहींईंईंईं।”

“अरे बेवकूफो, अगर मैं मैडम ही रहती तो तुमलोग खुलकर नहीं खेलते ना मेरे साथ।”

“हां, वो तो है।” सलीम खिसियानी हंसी हंस रहा था।

“तभी दरवाजे की घंटी बजी, खाना आ चुका था। अबतक ये लोग आधे अधूरे कपड़ों में थे, अतः मैं ही खाने के पैकेट्स को रिसीव करके अंदर आई। अब सभी खुल चुके थे। कोई झिझक शरम नहीं थी।

“कपड़े मत पहनो तो भी चलेगा।” मैं बोली। “बोलो तो मैं भी खोल देती हूं अपने कपड़े।” मैं उनके उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर नंगी हो गयी। अब मैं दमक रही थी लेकिन मेरी योनि फूल कर कुप्पा बनी हुई थी। मेरी देखा देखी वे भी नंगे हो गये।

“ठीक है, ठीक है, चलो शाम तक कोई कपड़े नहीं पहनेगा।” सलीम घोषणा कर बैठा।

“ठीक है।” सब सहमत थे। सब बेशरमों की तरह आदमजात नंगे, आपस में ठिठोली करते हुए खाने की मेज पर आए। मैं सोच रही थी, अपने हवस की आग बुझाने की नित नये प्रयोग नें मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया था। इन रेजाओं से बदतर हालत हो गयी थी मेरी। रेजाओं से क्यों, वेश्याओं से भी बदतर हो गयी थी मैं। पता नहीं क्या सोच रहे होंगे सब मेरे बारे में, लेकिन मैं  बेफिक्र थी। नुचती रही, पिसती रही, चुदती रही लेकिन जानती थी कि सबकुछ मेरे नियंत्रण में ही था। मैं कोई अतिरिक्त जोखिम में थी भी नहीं, यदि मुझे लगता कि मेरे नियंत्रण से बाहर जा रहा है सबकुछ, तो खुद की असलियत प्रकट करके बचने का मार्ग तो था ही। खैर उसकी नौबत नहीं आई। अच्छी बात हुई, रोमांच का रोमांच और मजा का मजा। तकलीफदेह ही सही, अपनी क्षमता का आंकलन तो कर ही चुकी थी। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, सात सात मर्द, बारी बारी से अपने अपने तरीके से भोगा मुझे, नोचा, रगड़ा, निचोड़ा लेकिन वाह रे मैं कंबख्त रांड, झेल गयी सफलतापूर्वक। गर्व की अनुभूति हो रही थी। सोमरी और कांता के लिए यह एक अविश्वसनीय दृष्य था। जलन और ईर्ष्या से मुझे घूर रही थीं। अब भी, सबके सम्मुख बेशर्मी से नंगी बैठी मजे में बेझिझक बातें कर रही थी। हमारे बीच की सारी दूरियां, झिझक खत्म हो चुकी थी। मैं उन्हीं मजदूरों के समकक्ष खुद को पेश करने में सक्षम हो चुकी थी। ऊंच नीच का भेदभाव खत्म हो चुका था। वे स्वतंत्रता पूर्वक मुझसे चुहल कर रहे थे।

खाना खाते खाते, सलीम बोला, “तो मैडम…..”

“न न न मैडम नहीं।” मैं बीच में ही बात काट बैठी।

“अच्छा, कामिनी जी।”

“नहीं, ‘जी’ नहीं।”

“अच्छा, कामिनी।”

“नहीं, कामिनी नहीं।”

“फिर?”

“चांदनी।” मैं बोली।

“नहीं।” बोदरा बोला, शैतानी उसकी आंखों में नाच रही थी।

“फिर?” मैं सशंकित हुई।

“चोदनी।” बोदरा बोला। सभी ठठाकर हंस उठे। हंसते हुए कांता और सोमरी की चूचियां हिल रहे थे। मैं हंस पड़ी।             “ठीक है, आज से मैं तुम लोगों की चोदनी।” मैं सहमत थी अपने नये नामकरण पर। “अरे तुमलोग भी कुछ बोलो ना। खुल के बोलो। जो मन में है बोल डालो।” कांता और सोमरी की ओर देखती हुई बोली।

“का बोलें? चोदनी कहीं की।” मेरी असलियत जानकर झेंपती, वाचाल कांता का अब मुह खुला।

“हां, ये हुई न बात।”

“लंडखोर।” अब सोमरी का भी मुंह खुला।

“कुत्ती, बुरचोदी।” अब कांता बिंदास हो गयी।

“और ये हरामजादे कौन हैं?” मैं मर्दों को दिखा कर हंसते हुए पूछी।

“ई सब कुत्ते हैं, औरतखोर कुत्ते। औरत देखा नहीं कि लंड खड़ा, सब के सब मादरचोद एक नंबर के।” अब सोमरी भी रंग में आ गयी।

“अच्छा यह बताओ, तुम सब एक तरह के लोग इस ठेकेदार के हाथ कैसे लगे?” मैं पूछ बैठी।

“ई हम बताएंगे, लेकिन खाना खाने के बाद।” इतनी देर से चुप गांडू मुंडू बोला।

आगे की कथा अगली कड़ी में। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।